गुरू बिन...

 

शीर्षक़ : गुरू बिन...

गुरु बिन कहाँ मिले है सिद्धि?
सुवर्ण तपा चमकायें जो बुद्धि!

निद्रा के अधीन जो अज्ञानी,
गुरु ही जगाये सुना ईश-वाणी!
गुरु करे जागृत अवचेतन मन,
अमृत वाणी, ब्रह्म-मुहूर्त पूजन !

गुरु बिन कहाँ मिले है रिद्धि?
सुवर्ण तपा चमकायें जो बुद्धि!

खोल मस्तिष्क के बंद किवाड़,
दुलार कभी, प्यार भरी लताड़,
शिल्पकार सम शिला को फोड़,
वांछित स्वरुप दे छीनी से तोड़!

गुरु बिन कहाँ मिले है सद्बुद्धि?
सुवर्ण तपा चमकायें जो बुद्धि!

दरजी सम गुरु बेते थान,  
शिष्य तैयार करे सुंदर परिधान!
पढ़ा पाठ, लेते परीक्षा, देते ज्ञान,
ज्ञान-चक्षु खोल, सीखलाये विज्ञान!

गुरु बिन कहाँ मिले है अभिवृद्धि?
सुवर्ण तपा चमकाए जो बुद्धि!

गुरु तारे तो ही तरे भव-सागर,
गुरु कृपा बिन न भरे ज्ञान-गागर,
गुरु बिन कैसे मिले कृपा-सागर?
गुरु बिन कैसे पाऊ मोक्ष-आगर?

गुरु बिन कहॉं रिद्धि, सिद्धि, वृध्दि?
सुवर्ण तपा चमकाए जो बुद्धि!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र|

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