छंद!
माँ शारदे को नमन!
द्विगुणित सुंदर छंद /मुक्तक
मात्रा भार : 12 12 पदान्त:  दो गुरु:

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ले त्रिशूल हाथों में, करती व्याघ्र सवारी।
खल संहारक देती, सजा शस्त्र से भारी
ममता की है ढाणी, हो तुम मात दुलारी।
रसमय लगती वाणी, जैसे मुरली प्यारी।।
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मुरलीधर सुन बंशी, सुध-बुध भूली राधा।
प्रीत रीत है भूली, लोक-लाज की बाधा।।
एक रूप हो राधा, हुई कृष्णमय प्यारी।
आत्मा से परमात्मा, मिलन कथा यह न्यारी।।
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सकुशल घर को लौटी, अंतरिक्ष की रानी।
मधुमय सपने देखे, आँखें कहें कहानी।।
धीरज-जीवट सच्ची, मन में  लगन पुरानी।
दृढता से है पाई, मंजिल सब अनजानी।।
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जग जानी-पहचानी, नारी यह अलबेली।
मंजिल अपनी पाने,  नौ थी मास अकेली।
भार रहित ही तैरी, बन अंतरिक्ष यात्री।
कुक्षी में शिशु मानों, धरती ममता दात्री।।
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हिम्मत हो सीने में, हो प्रयास जब पक्के।
गागर भरती बूंदे, गुल्लक भरते टक्के।।
मधु मक्खी के छत्ते, पत्तों में हो इक्के। 
जीत उसी की होती, बल्ला मारे छक्के।।
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बरगद है संजोता, सुरभित अनुभव थाती।जीवन यात्रा लम्बी, किसे नहीं है भाती।
जड़ें भूमि से जोड़ी, आतुर कर नभ छूने ~
मद बिन अतिशय चर्या, मन को खूब सुहाती।।
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तोता-मैना बोले, मन के ताले खोलो।
राम नाम सब ले लो, तन-मन मैला धोलो।
अपना धर्म निभाना, मातृभूमि पर छाना ~
देकर खुद कुर्बानी, गीत वतन के बोलो।।
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नेता बन अभिनेता, खेलें अपना 'खेला'।
समझें जन-गण प्यादा, राजा बन अलबेला।। कुंभकर्ण सम सोएं, निर्वाचन तब जागें ~
कंधों पर चढ़ देखो, जनता देता ढेला।।
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साधक बनकर प्यारे, करना वारे-न्यारे।
अनुशासन से जी ले, खल को धूल चटा रे। 
मानव जीवन पाया, इसको सफल बना रे।
परचम मानवता का, मनु जग में फहरा रे।।
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पिता शाम घर लौटे, खरबूजा ले आए। 
जैसे पंछी दाने, चूजों खातिर लाए। 
फल के हम बच्चों ने, टुकड़े-टुकड़े खाए। 
बचपन में हम ऐसे, प्यार पिता से पाए।। 
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पत्थर से प्रतिमा की, यात्रा बड़ी अनोखी।
घाव सहे छैनी के, तब मूरत हो चोखी।
मान-निरादर दोनों, मनुज कृत्य की माला। 
अहंकार से दूरी, जीवन गीत निराला।। 
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हिम्मत हो सीने में, हो प्रयास जब पक्के।
गागर भरती बूंदे, गुल्लक भरते टक्के।।
मधु मक्खी के छत्ते, पत्तों में हो इक्के। 
जीत उसी की होती, बल्ला मारे छक्के।।
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निरखे राधा भोली, कालिंदी में छाया।
नैना चमके मोती, श्री ने जग भरमाया।।
भीगी जल में चोली, थर-थर कांपे काया।
गोप-गोपियाँ खेले, वस्त्र छुपा हरि आया।।
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फूलों से मनु सीखो, सौरभ तुम फैलाना।
जलधारा सम सीखो, जीवन सुखद बनाना।
खाकर पत्थर देते, वृक्ष-लता फल मीठे ~
मानव हरदम भूले, प्रकृति दुआएं पाना।।
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मन की पाँखे खोलो, गीत मधुर तुम गाओ।
हर्षित जग को देखो, निर्मल हृदय बनाओ।
वृद्ध-बुद्ध कर सेवा, ईश रूप बन जाओ।असि-मसि के बलबूते, नाम विश्व में पाओ।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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