अंतरिक्ष की "कल्पना"....

अंतरिक्ष की "कल्पना" मैं या कल्पना का अंतरिक्ष!

ब्रह्मांड में समाऊ या प्रज्वलित करू ब्रह्म ज्ञान दीप!
हिमशिखरों का मुकुटमणि या नभ का उतुंग भाल!
क्षितिज का स्वर्णिम छोर या पृथ्वी का तेजोमय कपाल!
 
नव कल्पना की उड़ान मैं, 
मैं सोच का विस्तृत आकाश!
समय का आगाज़ हूं मैं, 
अक्षुण्ण आभा, अद्भुत प्रभास!
अविष्कार की जननी मैं, 
मैं रचना का अनुपम संसार!
नव सृजन का न्यास मैं, 
नव निर्माण का अविरल भंडार!
धरती पर बोया बीज मैं, 
मैं सृष्टि की हरियाली आस!
सूरज की सहस्त्र रश्मियों की जननी, 
मैं तेजोमय प्रकाश!
शिव शंभो की प्रियतमा मैं, 
मैं भागीरथ का प्रयास!
जटा से निकली गंगा मैं शमिता, 
बुझाऊं धरा की प्यास!
हंस वाहिनी की प्रियंवदा मैं, 
मेधा की मैं गुण गाती!
मयूर पंख से लिखने बैठूं मैं, 
भविष्य की उज्वल पाती!
साहित्य का आभूषण मैं, 
कलम का शृंगार हूं मैं!
छंद का प्राण हूं मैं, 
अलंकार से अलंकृत हूं मैं!
 
आदिशक्ति मैं, शक्ति स्वरूपा! जगत जननी मैं, विश्व स्वरूपा!
ॐ कार स्वरूप मैं, गणाधीश मैं, अधिष्ठात्री मैं, सौम्य स्वरूपा! 
 
सृजनशीलता की नीव मैं, रचनाकार का आधार मैं!
फलक पे सजी अल्पना का साज मैं, रंग मैं, अंग मैं!
परमात्मा की हर कल्पना की, झलक मैं, आरंभ मैं, विस्तार मैं!
 
 
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
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