भाग ८
आज भोर में ही वैदेही की नींद खुल गई थी! कितने दिनों बाद खिड़की से सूर्योदय को देख कर उसका मन प्रफुल्लित हो गया..उसने रजाई को समेट कर तकिये के उपर रक्खा और हवाई चप्पल पहन वह आँगन में चहल-कदमी करने लगी! हवा के मंद-मंद झोकों के साथ नन्हे हरे-भरे पत्ते नृत्य कर रहें थे! वह पारिजात के करीब पहुंची ही थी कि पवन का तेज झोंका आया और उसके मस्तक पर सफ़ेद-केसरी फूलों की वर्षा कर नटखट, शरारती बच्चे सा तालियाँ बजा-बजा कर उछल-कुद करने लगा! उसने हथेलियों में पारिजात समेटे और उन्हें गणपति बाप्पा को भेंट करने के लिए हार बनाने के लिए सुई धागा लाने की सोच ही रही थी कि पास के गुलाब के पौधे में उसकी चुनरी अटक गई! वह उसे सुलझाने की कोशिश में जुटी ही थी कि उसे लगा शायद गुलाब उससे शिकायत कर रहा है, "दीदी! यह तो बहुत नाइंसाफी है! क्या तुम सिर्फ पारिजात से ही प्यार करती हों? मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ... देखों! मेरी पंखुड़ियाँ भी थक गई हैं तुम्हारी राह देखते-देखते... दीदी! अभी सूर्यदेवता आयेंगे..उनकी किरणों के छूते ही यह नई कली खिल जाएगी.. प्लीज! इसे भी तो बाप्पा के चरणों पर स्थान दे दो न दीदी!"
वैदेही मुस्कुराई! गिले-शिकवे में प्यार की सुगन्ध ही तो समाई है! अच्छा भई ..अच्छा...मैं अभी आई तुलसी माई को कुंकुम-हल्दी से सुशोभित करके... उसे भी तो मिले काफ़ी दिन हो गएँ हैं... तुलसी का कुंकुम-हल्दी से पूजन कर, गुलाब को हथेली में समेट वह घर के अंदर आ गई!
खिड़की दरवाज़े से झाँकती आदित्य की सुनहरी रश्मियाँ मन के चपल हिरन को सुवर्ण-मृग बना रही थी!
सुवर्ण-मृग को देख जब वनवासी 'वैदेही' अपना मोह नहीं रोक पाई तो यह वैदेही कैसे मन को संभाल पाती? वह सूरज की असंख्य रश्मियों में नहा रही थी.. जीवन का आनन्द ले रही थी..तभी माँ की कड़क आवाज़ ने उसे याद दिला दी कि उसकी 'कड़क चाय' उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रही है!
कई दिनों बाद आज माँ-बेटी दोनों एक साथ चाय, नमकीन शकरपाळी और रवा-हलवा (सिरा) का लुत्फ़ उठा रही थी! वैदेही को पूर्व-स्थिति में लौटते देख उसकी माँ थोड़ी चिंता-मुक्त दिखाई दे रही थी..उसका चेहरा स्मित-हास्य से दमक रहा था!
तभी आबा का फ़ोन आया.. माँ फ़ोन पर बात करते-करते खाली मग लेकर बेसिन की तरफ चल पड़ी... आबा जानते थे इन पंद्रह दिनों में माँ को अपने बारे में सोचने का वक़्त ही नहीं मिला! वह पूछ रहें थे, "पोरी! कोणाला पाठवू का मदतीला?"
माँ की आँखें भर आई..वह मन ही मन सोचने लगी...एक पिता की तरह... कितना सोचते है आबा मेरे बारे में! मेरे कुछ कहने की जरुरत ही नहीं पडती.. खुद ही समझ जाते है...मेरे मन के भाव! बचपन में ही पिता का साया माँ के सिर से चला गया लेकिन रच्चनहारे ने आबा के रूप में पिता के दुलार की कमी पूरी करने की कोशिश की!
आबा कह रहें थे आज-कल में... हो सकता है वज्र को भी डिस्चार्ज मिल जाएँ.. "पोरी! वैदेही ला घेऊन यें न आज हॉस्पिटल मध्ये" वह वैदेही को पुकारती ड्राइंग रूम में चली गई...
वैदेही मोबाइल पर गाने सुनते-सुनते बाप्पा के लिए हार बना रही थी! जैसे ही वह पारिजात का फूल हाथ में लेती, उसे लगता कोई श्वेत आम्रपाली कुर्ता और केसरियां रेशमी सलवार पहन, धवल चुनर लहराती नव-यौवना उसके करीब आ कर उसे 'जादू की झप्पी' दे रही है...
माला के मध्य में गुँथा हुआ गुलाब मानों उसकी मासूमियत पर मुस्कुरा रहा है!
माँ ने वैदेही को कहा, "चार बजे के बाद वज्र को मिलने जाएंगे..आओगी न?" वैदेही तो मन ही मन यही सोच रही थी! विनय के अल्बम ने उसकी यादों को नया आकाश दे दिया था! कल्पना के परिंदे क्षितिजरेखा को चुम कर मुस्कुरा रहें थे.. मानों इंतज़ार कर रहें हो इस 'युवा ब्रिगेड' का..कब लौटेंगे यें 'न्यू नार्मल' की तरफ और उड़ान भरेंगे अंतरिक्ष की टोह लेने चन्द्रमा की ऒर! कब देगा उन्हें 'शिव शक्ति ' स्थल नई ऊर्जा, नए अभियान के लिए?
कुछ समय आराम करने के बाद माँ-बेटी चल पड़ी ग्लोबल हॉस्पिटल की ऒर...दिवाली के लिए माँ को कुछ खरीददारी भी करनी थी लेकिन उन्हें वैदेही को भीड़ में ले जाना उचित नहीं लग रहा था... उन्होंने अकेले ही मार्केट जाने का प्लान बनाया!
जब वो पहुंची तब आबा रिसेप्शन में उनका इंतज़ार कर रहे थे... वैदेही को साथ देख उनकी आँखों में मानों जान आ गई थी.. वो बोल पड़े.. "वज्र कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है .."
आबा का विजिटिंग कार्ड ले कर माँ-बेटी दोनों एक साथ वज्र को मिलने पहुंची.. थोड़ी देर बात कर, उसके आने तक वैदेही को वहीं रुकने के लिए कह कर माँ मार्केट जाने के लिए नीचे रिसेप्शन में चली गई...
वज्र आज खुद को बेहतर महसूस कर रहा था..समतोल, पौष्टीक आहार, सही देखभाल, उचित दवाईयों का असर उसके चेहरे पर साफ नज़र आ रहा था! वैदेही का हाथ हाथ में लेकर वह बोल पड़ा, " थैंक्स वैदेही! बुरे वक़्त में मेरा मजबूत सहारा बनने के लिए.. "
तभी वैदेही ने उसके होठों पर अपनी उंगलियाँ रख कर कहा," बचपन के दोस्त न हम ? फ़िर ये फॉर्मलिटीज किसलिए?"
वज्र ने हल्के से उसकी उंगलियों को चूमा! "ओ हो.. सॉरी यार..." कह कर वह मुस्कुराया! कॉलेज जा रही हो अभी? वैदेही ने ना में सिर हिलाया..
वज्र बोल पड़ा, "बहुत मिस कर रहा हूँ मैं सबको! यश कहाँ है? अभी तक आया नहीं जयपुर से? और विभा तो भूल ही गई है मुझे! यार! दिवाली कब है? अब घर जाना है यार! बहुत हो गया यह हॉस्पिटल... हॉस्पिटल का खेला! मानों एक ही बार में पूरी उम्र भर का कोटा पूरा कर दिया है मैंने!"
तभी वैदेही ने मोबाइल की गैलरी में सेव किए हुए फोटो वज्र को दिखाएँ...
वज्र एकदम खुश हो गया.. यार! मोबाइल हाथ में लिए पंद्रह-बीस दिन हो गएँ... कहाँ मोबाइल के बिना पांच मिनिट नहीं चलता था और कहाँ यें दूरियाँ.... और वह मुस्कुराने लगा!
इतने दिनों बाद वज्र को खिलखिला कर मुस्कुराते देख वैदेही फूले नहीं समा रही थी... खिड़की से अलविदा कह कर पश्चिम की ऒर जाता सूरज और वैदेही को उम्मीदों के आसमान में नए चाँद-सितारें दिखाई दे रहे थे!
वैदेही ने स्वयं के साथ वज्र को भी संभाला! क्या पता..
ज्यादा उत्तेजना, अभिव्यक्ति का अतिरेक... अभी भी वज्र के लिए नुकसानदेह हो...
रिसेप्शन पर खड़े डॉ साहब को देख आबा वज्र के रूम में पहुँच चुके थे! आज वज्र के डिस्चार्ज के बारे में पूछना था उन्हें..दोनों ही चाहते थे दीवाली के पहले घर पहुँचाना... आखिर कितना भी सुविधाओं से लैस क्यों न हों, हॉस्पिटल तो हॉस्पिटल ही है न...
वज्र और वैदेही की आँखों में नए सपने जन्म ले रहें थे... खुशियों के झूलों पर झूलना चाहते थे वो... नई ऊँचाईयों को छूना चाहते थे वो... समय को चुनौती देना चाहते थे वो..
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |
शेष कहानी अगले भाग में..