शीर्षक : 'छम्मा छम्मा'
प्रोफेसर भावविभोर हो कर पढ़ा रहे थे .....अचानक उन्होंने प्रश्न किया, ' बच्चों! क्या आपको 'गायत्री मंत्र' आता है ? पूरी क्लास खामोश.... तभी पीछे से एक नटखट, धीमी आवाज आई, 'सर! 'उर्मी मंत्र' आता है ! बोलू... वही जो अक्सर 'मनी मंत्र' के ताल पर 'छम्मा छम्मा' करता है.....
शिक्षक अवाक् ! बच्चे ठहाके मार कर हँसने लगे ....प्रोफेसर के सामने अपना माथा पिटने के सिवा कोई आप्शन नहीं था ....न तो स्टूडेंट पर हाथ उठा सकते थे न उसे 'नी डाउन' करा सकते थे ...आखिर ट्रस्टी का 'कुलदीपक' था वह....
'पैसा सब कुछ नहीं मगर खुदा से कम भी नहीं' कहने वाले आपको जीवन के हर मोड़ पर मिल ही जायेंगे! ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों नैतिक मूल्य अपनी आभा खो चुके हैं..
दौलत की धुंध ने मानो ज्ञान के सूरज को ढँक दिया है ...
प्रोफ़ेसर साहब अंतरमुख हो सोचने लगे....
पैसा तो पैसा है भई ..श्वेत हो या श्यामल…रक्तरंजित हो या धवल, शुभ्र! ....किसी भी मार्ग से, किसी भी साधन से आये ...न साध्य की शुचिता जरुरी है न साधन की...लक्ष्यपुत्र हो तो समाज आपको कंधे पे उठाकर नाचने के लिए तैयार बैठा है .... नोटों की गड्डियों के साथ 'छम्मा छम्मा' करते आओ तो भावभरा वेलकम और खाली हाथ आये और निकल गए तो ... भीड़ कम....
समाज को आपके आचार, विचार, व्यवहार से कोई लेना देना नहीं.....
अवचेतन मन उन्हें धिक्कारने लगा! आखिर लक्ष्मी जी के सामने सरस्वती जी की अवमानना क्यों?
आप लोगो की गाढ़ी कमाई को लील लो... नो प्रॉब्लम...मगर भगवान के मंदिर में ऊँचे-ऊँचे चढ़ावे जरूर बोलो....आप बुजुर्गो की सहायता राशी गटका दो... उनकी ज़िन्दगी भर की बचत को बिना डकार लिए हजम कर दो... कोई गिला-शिकवा नहीं मगर समाज के उत्थान के लिए बनी कमिटी के अध्यक्ष जरूर बन जाओ....मोटी रकम लिखा कर... आपके सौ गुनाह माफ़!
चुनाव जीतने के लिए हर जायज-नाजायज हथकंडा अपनाओ और समाज सेवा का प्रण लो ....किसी की जन्म-जयंती पर गाँवो को गोद लो ...कोई हर्ज नहीं...जनता के ही जुते..जनता का ही सिर ...क्या फर्क पड़ता है? आप मानव तस्करी करो ...कच्ची कलियों का सौदा करो ...नन्हे बच्चों को शेखों को बेच दो ....चंद सिक्कों के लिए मानव अंगो की खरीद-फरोश्त करो ..हथियारों का जखीरा जमा कर देश के अस्तित्व को खतरे में डाल दो ...नशा करो ...नशीली दवाईयां बेचो ...कोई बात नहीं! मगर हा!! थोडा सा हिस्सा जरुर कमिशन के रूप में कुत्तों के लिए फेंक दो ...
ये भेड़-बकरियों सी मासूम, भोली-भाली जनता आपके ताल पर 'छम्मक छल्लो' बन 'छम्मा छम्मा' करने को बेताब हैं! सिक्के फेंको और तमाशा देखो ....
हर जगह एक ही शोर सुनाई दे रहा है युवा देश के शिल्पकार को, भविष्य निर्माता को..
प्रोफ़ेसर साहब को ...."जर, जरा, जमीं तो क्या जमीर बेच देंगे ...सौदागर है हम! वतन बेंच देंगे" ...
एक ही सीख दी जा रही है देश के नौनिहालों को .....' रुपए-पैसों से ज्यादा, नहीं कोई प्यारा ...रिश्तेदार हो या वतन हमारा '
भाँग कुएँ में घुली है...कौन बचेगा इससे?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!