भैया दूज
आज भैया दूज का त्यौहार है। रश्मि सुबह से ही पीहर जाने के लिए उतावली हो रही है। रश्मि का मन सबसे मिलने के लिए आतुर था। सोजस और सोहम भी नानी हाऊस जाने के लिए कब से तैयार बैठे थे। पुन्नु मासी जी के बच्चें उमा और रमा के साथ खूब धमाचौकडी करेंगे। चाहे कितना भी शोर करो, नानी किसी को डांटने नहीं देती। शैतानी करो और नानी के आंचल में छुप जाओ। नाना जी सबके मित्र बन जाते है। दिनभर आंगन में खेलो। दोपहर धूप में बाहर जाने की सख्त मनाई थी। ताश के पत्ते, सांप सीढी, लूडो, चौखट खेलते रहो। नानीजी के बने स्वादिष्ट व्यंजन चटकारे ले लेकर खाते रहो। रश्मि अपनी सहेलियों संग बतियाती रहती। यादों की फुलझडीयां उन्हें हंस- हंस लोटपोट कर देती। एक बार दुबारा अपने बचपन में लौट आयी हो जैसे। सोमेश सबको मिलकर चले जाते। बहन भाई बचपन की मधुर स्मृतियों में खो जाते। भाई-बहन के स्नेह का प्यारा त्यौहार है यह भैयादूज। खिलखिलाहट से गूंज जाता घर-आंगन। दीप जलातें हंसी-ठिठोली से चहक रहे थे सब। मां कब से खाना खाने के लिए बुला रही थी। अब तो बाबुजी ने भी पुकारा है। सब आज भी बाबुजी से डरते हैं, आदर मिश्रित डर, जो मन को डराता नहीं, प्यार की शीतल छाँव का एहसास कराता है। प्रभु परमात्मा की पूजा अर्चना कर, माता पिता के चरणस्पर्श कर दोनों बहनों ने भाई रोमेश की आरती उतारी। मंगल भावना के साथ खूब आशीर्वाद दिये। जल्द ही सुंदर सी भाभी ढूंढ लाने का भरोसा दिया। खाना खाते-खाते महफिल सज गयी। उमा, रमा की तोतली बातें, सोजस, सोहम की मजेदार कहानियां सबको गुदगुदा रही थी। नानी सबको खिलाकर तृप्त हो रही थी। नानाजी से बच्चें अपनी फरमाइशें पूरी करवा रहे थे।
मामाजी से सबको खूब सारे खिलौने मिले थे। सब अपने अपने उपहार खोलकर एक दुसरे को बता रहे थे। तेरे वाला, मेरे वाला एक दुसरे को बताते शहंशाह बन रहे थे।
बैठे-बैठे हंसी-मजाक हो ही रहा था कि डोर बेल बजी।
सोहम आये थे। रोमेश ने उन्हें बुला लिया था। अकेले घर पर उनको भी अच्छा नहीं लग रहा था। झट से हां भर दी और पहुंच गये ससुराल।
मां बाबुजी सबको देख देखकर खुश हो रहे थे।
शुभकामनायें ले आयी दीपावली, नव वर्ष ने सब के मन में स्नेह का उजास भर दिया था। धुमधाम से दीपोत्सव मनाया गया। भैयादूज मनाकर दोनों बहने अपने घर लौट आयी। उमा, रमा, सोजस, सोमेश नानी को पकड कर खडे हो गये।
" छुट्टियों में हम यही रहेंगे।" एक साथ सब बोल पडे। बात-बात पर झगडा तंटा करनेवाले एक हो गये थे। नाना-नानी की आंखें खुशी से दमक रही थी।
स्वरचित मौलिक कहानी
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र