अरे मुढ़मति, बुद्धि की गागर भर।
जीवन को स्थितप्रज्ञ रत्नाकर कर।।
सुख-दुख जीवन-नैया के दो चप्पू।
कर्म यज्ञ रख जारी, मत बन रे गप्पू।।
मनुज जन्म दुर्लभ मनु कर भव पार।
चुनौतियों से हौसला कभी मत हार।।
अरे मंदबुद्धि,
प्रभु-आज्ञा को रख सिर-आँखों पर।
जीवन को स्थितप्रज्ञ रत्नाकर कर।।
मोह-माया भंवर में मनवा गोते खाता।
सपनों को झूठी आशा से खूब सजाता।
अवचेतन मन में राजसी महल बनाता।
जीवन अनबूझी पहेलियों में उलझाता।।
अरे बावरे,
मन-घोड़ों की लगाम रखना कस कर।
जीवन को स्थितप्रज्ञ रत्नाकर कर।।
सुन जग की, कर अपने अंतर आत्मा की।
रेगिस्तान में दूर तलक फैले मृगजल की।।
तपती रेत की आग में हिम्मत से चलने की।
चट्टानों से लड़ते-बिखरते अटूट मनोबल की।।
अरे सिकंदर,
जीत जंग निज ह्रदय पटल से डट कर ।
जीवन को स्थितप्रज्ञ रत्नाकर कर।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई।