ये प्यार ही तो ज़िन्दगी....भाग २५
भाग २५

नुक्कड़ नाटक की तैयारी में विभा उस दिन यश को दिव्या के विवाह की निमंत्रण पत्रिका देनी भूल गई थी! आज यश को देखते ही उसने लग्न पत्रिका हाथ में निकाल कर रख दी! यश पत्रिका देख बोल पड़ा, " विभा! किसकी गिल्ली उछालने का इरादा हैं यार? कौन हैं वो बेचारा? विभा जोर-जोर से हँसने लगी... अरे यार.. खुश तो बहुत होगा तू... वो बेचारा तू नहीं है! अरे बुद्धू! दिव्या की शादी की पत्रिका हैं यह.. माला आंटी उस दिन तुझे खुद दे न सक़ी इसलिए यह काम मेरे कन्धे पर डाल, चली गई वह कराड! 
यश भी दिल खोल कर मुस्कुराने लगा मानों बारिश की फूँहारों से धरा पर बिखरे चमेली के फूल! आज यश को "वैश्विक बाज़ार में भारतीय उत्पादों की स्थिति" विषय पर कॉलेज का एक प्रोजेक्ट भी पूरा करना था! दिसंबर की ठण्डी-ठण्डी मन को लुभाती खुशनुमा बयार का स्पर्श 
यश को उल्हासित कर रहा था! प्रोजेक्ट का सूत्रधार होने की वजह से उसकी जिम्मेदारी भी औरों से ज्यादा थी! यश के पास किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान की थाती भी थी! मूल्यवान पत्थरों (precious stones) के व्यापार में उनके कई देशी-विदेशी ग्राहक थे जिनसे रोज उनका लेनदेन चलता रहता था! अनुभव को अगर नई तकनीक का साथ मिल जाएँ तो व्यापार को फलने-फूलने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता यह यश बखूबी जानता था! सही दिशा में किए गए प्रयत्न हमेशा सही नतीजे देते हैं तथा लक्ष्य-प्राप्ति में अमूल्य योगदान.. यश सफलता का फंडा सीख चूका था..

आज वैदेही के यहाँ नुक्कड़ नाटक की प्रैक्टिस थी! सभी एक-दूसरे से  'हाय.. हेलो' कर जल्दी-जल्दी घर की तरफ निकल पड़े! पढ़ाई-लिखाई को भी समय देना जरुरी था क्योंकि वार्षिकोत्सव की जगमगाहट ख़त्म होते ही इम्तिहान का दबाब शुरू हो जायेगा यह सभी जानते थे! 
विभा और यश साथ-साथ चले गएँ और वज्र और वैदेही घर की ऒर निकल पड़े! आज सब वैदेही के यहाँ आने वाले थे! वैदेही को घर के बाहर छोड़ कर वज्र आगे बढ़ गया! आजी, बाबा तथा वज्र की आई को सासवड पहुँच कर दो दिन हो चुके थे! आबा ऑफिस के काम में व्यस्त हो गये थे और वज्र अपनी पढ़ाई में! 
नुक्कड़-नाटक देखना-करना, किताबें पढ़ना, मोबाइल पर अलग-अलग विषयों पर रील-विडिओ देखना वज्र का शौक था और यहीं उसका तनाव-मुक्त होने का रामबाण उपाय! वैसे संगीत उसकी पहली पसंद थी... जब भी वह खुद को असहज महसूस करता, पुराने-नए पसंदीदा गाने मोबाइल पर सुनता और वह उनमें खो जाता मानों समंदर में समाई उफनती लहरें!
समय से पहले ही वज्र वैदेही के यहाँ पहुँच गया था! वैदेही जब भी उसके करीब होती, उसका मन-मयूर पँख फैला कर नृत्य करता नज़र आता! मानों वैदेही जीवनदायिनी संजीवनी थी! उसके अधरों को स्पर्श कर निकले बोल वज्र को सम्मोहित करते! वैदेही का अस्तित्व ही उसके लिए कल्पवृक्ष के समान था! 
वज्र और वैदेही अपने संवादों पर विचार-विमर्श कर रहें थे तभी यश और विभा ने बंगले के फाटक पर दस्तक दी! "वज्र! क्या यार! किला फतह करने का इरादा हैं क्या? इतनी तैयारी? अद्भुत! वज्र! तुमसे तो सबको प्रेरणा लेनी चाहिए!"
तभी यश ने टोंक दिया.. "नहीं तो विभा को देखो! आधा समय चेहरे के रंग-रोगन में चला जाता हैं और आधा परिधान से मैचिंग आभूषण ढूंढ़ने में... बेचारी करें भी तो क्या?" तभी वैदेही बोल पड़ी... चलो! फ्रेश हो जाओ! पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा! 
विभा और वैदेही ने रसोई से लाकर सैंडवीच की सामग्री डाइनिंग टेबल पर रक्खी और वैदेही की माँ चाय की तैयारी में लगी थी ! चारों ने जानकी जी को बाहर बुलाया और जबरदस्ती बैठा कर उन्हें सैंडवीच की प्लेट थमाई! बच्चों की ज़िद के आगे अक्सर झुकना ही पड़ता हैं बड़ों को! फिर शुरू हुई सेल्फ सर्विस! जानकी जी जल्दी-जल्दी सैंडवीच ख़त्म कर रसोई में चाय बनाने चली गई और मित्र-मण्डली टूट पड़ी ब्रेड-बटर पर! जानकी जी के हाथ की चटनी और आलू का मसाला बहुत ही स्वादिष्ट था! ताज़ा सलाद,मक्खन और चटनी से चटोरों का दिल बाग-बाग हो गया था... जानकी जी की आवाज़ सुन वैदेही रसोई की तरफ दौड़ी और चाय की प्यालियां ट्रे में लेकर आई! सभी ने बातों के साथ-साथ एक-एक घूंट पी-पी कर चाय का लुत्फ़ लिया और जानकी जी को धन्यवाद दे चल पड़े वैदेही के कमरे की तरफ! वैदेही ने जानबूझकर "यूज & थ्रो " वाली प्लेटे और कप उपयोग में लाएं ताकि माँ पर काम का बोझ न पड़े! 
विभा ने अपनी डायरी निकाली और शुरू हो गई! यश एक कुर्सी पर बैठ गया और विभा ने अपना प्यारा एप्रन पहन लिया... गले में डोर बांध यश के हाथ में लकड़ी और डोर थमाई और शुरू हो गई...यश डुगडुगी बजा रहा था और बंदरिया उसके कान में बोल पड़ी.."मालिक! क्या हुआ? मुहूर्त तो ठीक हैं न? चलिए माई-बाप बाबा शकुनि के पास.. मुझे अमरत्व का राज जानना हैं... और यश के गले पड़ उस से लाड़ लड़ाने लगी! यश गुर्राया... "इतनी उतावली क्यों हो रही हो? बाबा के पास जाना हैं न प्रश्न पूछने...पैसा लेकर संसद में जनता के प्रश्न पूछने तो नहीं न ! थोड़ा धीरज रख बन्दरियां... जब देखो बेवजह उछलती रहती हो ... नादान कहीं की... और फिर डुगडुगी बजने लगती है और बंदरिया नाचते-नाचते गोल-गोल घूमने लगती हैं...
अब मंच पर दूसरा दृश्य उपस्थित होता हैं! वैदेही अब बाबा शकुनि का किरदार निभा रही हैं... वज्र उसे देखते 
ही रह गया! यश और वैदेही ठहाके मार-मार हँस रहें थे!
गेंदे के फूल के रंग की पगड़ी-धोती-कुर्ता... गले में रुद्राक्ष की माला, हाथ में रुद्राक्ष का ब्रेसलेट और कान में रुद्राक्ष के लटकन! बालों की जटाओं को समेट कर बांधा हुआ जुड़ा और उस पर भी रुद्राक्ष की माला! माथे पे चंदन का टीका, मस्तक के बीचोंबीच कुंकुम तिलक मानों शिव जी की तीसरी आँख और हथेलियों पर कुंकुम का गोलाकार टीके मानों मेहंदी लगी हो! बड़े से आसन के पास कमंडल और हाथ में रुद्राक्ष की जपमाल!
वैदेही उच्चासन पर विराजमान हुई! यश डुगडुगी बजाते- बजाते बंदरिया को बाबा के दरबार में ले आया! बाबा के चेहरे का तेज देख यश के साथ बंदरिया भी हाथ जोड़ खड़ी हो गई मानों हनुमान जी की वंशज!
बाबा ने अभय मुद्रा में हाथ खड़ा किया और उन्हें बैठने का संकेत दिया! "बोलो बेटा! क्या शंका-कुशंका हैं? "
मदारी बोल पड़ा.." बाबा! क्या आपकी कृपा से मनुष्य अमरत्व पा सकता हैं? कृपा करो बाबा.. कुछ उपाय बताओ बाबा!"
बाबा शकुनि ध्यानमग्न हो गएँ... कुछ पल बाद सामने रक्खी थाली में से कुछ फूल दोनों पर उछाल कर बोले, " कृपा होगी... अवश्य होगी भक्त! तुम्हें अमरत्व प्राप्त होगा... जैसा मैं कहूँ...वैसा करो! कृपा होगी... अवश्य होगी!"
बंदरिया उछल-उछल कर नाचने लगी, मदारी डुगडुगी बजाने लगा..."बाबा! आज्ञा करो बाबा!"
बाबा शकुनि के चेहरे का तेज बढ़ गया था!  अब ऊंट आ चूका था पहाड़ के नीचे..." तथास्तु वत्स! लेकिन कुछ भोग ज्यादा लगाना होगा..."
मदारी फिर डुगडुगी बजा कर बंदरिया को नचाने लगा! बंदरिया भी उछल कर खुशियाँ मनाने लगी... "मैं अमरत्व का मन्त्र जान जाऊंगी! उल्लला...उल्लला ....'
बाबा ने हाथ उठा कर दोनों को खामोश किया और फिर अपने तीसरे नेत्र को खोलने का अभिनय कर बाबा बोलने लगे, " कृपा होगी.. जरूर होगी! एक अनुष्ठान करना होगा! एक असली चाँदी के कटोरे में पुदीने की चटनी और  
इमली का पानी मिला कर लाओ! एक चाँदी की तश्तरी में  गोलगप्पे लाओ और भोग लगाओ! कृपा होगी.. अमरत्व प्राप्त होगा वत्स! तुम्हें और तुम्हारी बंदरिया को "
मदारी और बंदरिया खुश होकर नाचने लगे... कृपा होगी... हम अमर हो जायेंगे ... 'जय हो .. बाबा जी की जय हो " मदारी और बंदरिया सब इंतजाम करने का मन में ठान कर बाहर की ऒर चलने लगे.. डुगडुगी बज रही थी.. आवाज़ फ़िजा में गूंज रही थी...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
अगला भाग अगले अंक में....


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