पितृ पक्ष पर संवेदनाएँ!
जाण पूर्वजों की कृपा, सदा मान उपकार।
कैसे लौटाएं उन्हें, अनुपम सुख उपहार।।

तर्पण पितरों का करों, मोक्ष-मुक्ति का द्वार।
पिंडदान कर तृप्ति दूँ, आत्मा शान्ति अपार।।

आस अधूरी क्यों रहे, क्यों भटके बिन चैन।
क्यों मन की मन में रहे, भीगे-भीगे नैन।।

कृपा पूर्वजों की सदा, देती निश्चल शान्ति।
तर्पण-अर्पण से सखा, सदा खत्म हो भ्रान्ति।।

अन्नदान की भावना, देती समता भाव।
भरे पेट ही मानवी, होवे लाग-लगाव।।

काग, श्वान, गौ को खिला, अर्पण कर जल धार।
पूजन-अर्चन प्रार्थना, संभव भव-भव पार।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।



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