ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.... भाग १
भाग १

चांदनी रात में विनय पूरी रफ़्तार से जीप्सी दौड़ा रहा था! पूनम का चन्द्रमा उसका मानों पीछा कर रहा था! साथ में विभा, वैदेही, वज्र और यश भी थे.. गाड़ी हवा से बातें कर रही थी और सभी चिल्ला-चिल्ला कर सर्द हवाओं के साथ बतिया रहें थे। जवानी का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा था  न किसी को दुनिया की परवाह थी न लोक-लाज का डर! नई-नई जीप्सी का हैण्डल पकड़ कर वज्र झूम रहा था। खड़ा होकर लहरिया साफा लहराते हुए बिच में ही वज्र गाने लगा .. 
"मस्त हवाओं का मैं झोंका... मैं जो चाहे यार करूँ ...चाहे गुलों के सायें से खेलु, चाहे कली से प्यार करूँ " 
अभी उसने पूरा अंतरा भी नहीं गाया था कि यश दुनिया को भूल कर ओपन जीप्सी में अपना जूता निकाल कर आसमान में लहराता हुआ गाने लगा ..
"मेरा जूता है जापानी..यह पतलून हिंदुस्तानी.. सर पे लाल टोपी रुसी... फिर भी दिल है हिंदुस्तानी!"

सब के सब मस्तमौला ज़िन्दगी का जाम होठों से लगा कर जवानी के नशे में धुत घर की तरफ लौट रहें थे..नवरात्रि का त्यौहार ही कुछ ऐसा है! माँ के नौ रूप देख कर ही शक्ति का संचार हो जाता है भक्तों के मन में! ये तो गर्म खून था। अभी-अभी जवानी की दहलीज पर कदम रक्खा था उन्होंने.. मानों सारी दुनिया अपनी मुट्ठी में करने को उतारू थे।  
नवरात्रि का त्यौहार और यह टोली रंगबिरंगी पारम्परिक वेशभूषा में मैदान में गरबा रमता न होय ... असंभव! जवां दिलों की धड़कन है नवरात्रि का त्यौहार मानों राधा-कृष्ण की रासलीला! 
नवरंग से सजा पंडाल, संगीत की मधुर सुर लहरियां और तरह तरह के बांधनी, लेहरिया के चटक रंगों के विभिन्न आकार के टुकड़ों से बने, रेशमी धागों की कशिदाकारी से सजे, कांच के टुकड़े-कौड़ी-मणके-टिकली से सुशोभित परिधान,  राजसी साफा, शेरवानी, चुनरी-चनिया-चोली में सजी यह मतवालों की टोली पूरे वर्ष इंतज़ार करती थी इन लम्हों का...पूरा साल गरबा नृत्य के नए-नए स्टेपस ढूंढ उनकी प्रैक्टिस करने में बीत जाता इन छैल-छबिलों का। ढोल-मृदुंग के ताल पर थिरकते, गोलाकार आवर्तों में नाचते-गाते इन युवाओं को देख कई बार तो रश्क होने लगता था पचपन पार के लोगों को..इन्हें देख वो कसमसाते...अपनी जवानी को याद कर आहें भरते और भूली-बिसरी यादों को ताज़ा कर 'अभी तो मैं जवान हूं ' का दम्भ भरते। नाचते-नाचते यादें ताज़ा हो जाती और वो भी शामिल हो जाते इस महा-उत्सव में।  फिर ये युवाकैसे पीछे रहते? ये तो अभी-अभी डाल पर खिले फूल थे जो सूरज की सुनहरी किरणों के स्पर्श से अपने मुखौटे फेंक जीवन आनन्द लेने में व्यस्त हो गएँ थे।

लोकगीतों की सुन्दर प्रस्तुतियों पर भाव-विभोर हो नृत्य करते मातारानी के भक्तों को देख मन बाग-बाग हो रहा था...उत्कट भाव-भंगिमा के साथ ढ़ोल-मृदंग के ताल पर थिरकते कदमों को देख देख मन-मयूर आनंदित हो नृत्य कर रहा था। ढोलक की थाप पर गोलाकार घुमते युवाओं कोदेखने का मज़ा ही कुछ और था!  एक विशाल जनसमुद्र में डोलती, लहरों पर मचलती नावों सा दृश्य था वह! कंक्रीट के जंगल में रात दिन राह कर ऊबे युवाओं के लिए यह खुद को तनावमुक्त करने का, एक दूसरे से रूबरू होने का इससे बेहतर मौका भला क्या हो सकता था?

नवी मुम्बई में एक प्रसिद्ध गरबा गायिका के कार्यक्रम में शिरकत कर यह युवा ब्रिगेड घर की तरफ लौट रही थी। मस्ती में चूर, बहकी-बहकी सी अदाएं...एक तरफ खाड़ी के ऊपर के पुल से उनकी गाड़ी तेज रफ़्तार से गुजर रही थी तो दूसरे पुल से एक लोकल ट्रेन दनदनाती हुई लक्ष्य की ऒर बढ़ रही थी।

सभी मस्ती में हाथ हिला कर लोकल की तरफ देखकर बाय-बाय करने लगे... कोई अपना रुमाल हवा में लहरा रहा था तो कोई अपनी चुनर....तभी एक कानफोड़ू आवाज़ हुई और उनकी जीप्सी डिवाइडर को तोड़ कर विपरीत दिशा से आ रहें  एक पूरी क्षमता से लोडेड ट्रक से जा टकराई! 
इसके बाद क्या हुआ किसी को कुछ याद नहीं था! आस पास भीड़ जमा हो चुकी थी और वहाँ का दर्दनाक दृश्य देख कर सभी की आँखें नम हो चुकी थी! बड़ी मुश्किलें से लोगों ने एक-एक को बाहर निकला और जल्द से जल्द अस्पताल में पहुँचाया! खुशकीस्मत थे सभी की साब की साँसे चल रही थी और लोग भी मुकेश दर्शक बां वीडियो लेने के बजाय पीड़ितों की जान बचाने में लगे थे! जिप्सी की हालात देख कर ही दुर्घटना की भयावहता का अंदाजा आ रहा था।
वैदेही ने जब आँखें खोली तो उसके सामने उसकी माँ थी चिंतित मुद्रा में! उसने यहाँ-वहाँ देखा और पुछ बैठी, " माँ मैं यहाँ.. अस्पताल के बेड पर?" तभी वज्र के पिताजी को देख वह खामोश हो गई.. 
वज्र उसका पडोसी था! बचपन के दोस्त थे वो ! स्कूल-कॉलेज सब जगह साथ-साथ ही पढ़े थे दोनों! कुछ पल में उसे थका-थका महसूस होने लगा तो उसने आँखें बंद कर दी...सिर पर हाथ फेरती माँ का स्पर्श महसूस कर वह फिर गहरी नींद में खो गई! 
गाड़ी में सवार सभी को गहरी चोटे आई थी...यह तो एक ऊपरवाले का करिश्मा ही था कि उनकी साँसे चल रही थी और समय पर उन्हें अस्पताल में पहुंचा दिया गया था और सही समय पर इलाज भी मुहय्या कराया गया था। विनय कोमा में था और विभा और यश घायल अवस्था में ICU में भर्ती थे..चारों को  परेल के के. ई. एम. अस्पताल में भर्ती किया गया था! सिर्फ वज्र को उसके पिताजी पास के ही ग्लोबल अस्पताल में  दूसरे दिन शिफ्ट कर चुके थे...


वैदेही आज खुद को पहले से बेहतर महसूस कर रही थी! आस-पास वार्ड में नज़रे दौड़ाते ही उसे ऐसे लगा मानों दर्द का महासागर फैला है और उसका कही कोई छोर नज़र ही नहीं आ रहा है! वह सोच में डूबी हुई थी तभी उसके कानों में एक कांपती आवाज़ पड़ी, "गरम उप्पीट, पोहा, चहा..." आवाज़ सुनते ही माँ उठकर वार्ड से जल्दी-जल्दी बाहर चली गई...
गरमागरम पोहे का पैकेट और स्टील के ग्लास में चाय लेकर माँ लौट चुकी थी! डॉक्टर ने रात को ही वैदेही को कुछ नरम खिलाने की अनुमति दे दी थी! वैदेही उठ कर बेड पर तकिये के सहारे बैठ गई और नाश्ते पर टूट पडी पर जबड़े को लगी चोट उसे परेशान कर रही थी ! सिर की चोट से तो वह पहले ही बेहाल थी! उसके मस्तिष्क का MRI हो चूका था और न्यूरो-साइकोलोजी टेस्ट भी पूर्ण हो चूका था ! 
जूनियर रेजिडेंट डॉक्टरस तथा नर्स के साथ डॉ. मालिनी वैद्य ने वार्ड में प्रवेश किया! उसका व्यक्तित्व ही इतना आकर्षक था कि मरीज आधा तो उसे देख कर ही ठीक हो जाता था! एक मधुर मुस्कान से साथ उसने वैदेही से हाय-हेलो किया, माँ से कुछ बात की और वैदेही की पीठ थपथपा कर वह चल पड़ी अगले मरीज की ऒर!
वैदेही कुछ-कुछ अपने स्वाभाविक माहौल में लौटने का प्रयास कर रही थी! मन में उसे अपने प्रिय मित्रों की चिंता बेचैन कर रही थी.. तभी वज्र के पिता को आते देख वह सहम गई! उसे उनके रौबदार व्यक्तित्व और बड़ी-बड़ी मूछों से बहुत डर लगता था! हिम्मत कर वह उनसे वज्र के बारे में कुछ पूछती उसके पहले ही वह बोल पड़े, " वैदेही! कैसी हो बेटा! भगवान का शुक्रिया अदा करों कि तुम सब ऐसे भयानक हादसे में बच गएँ..." वो और कुछ बोलते उसके पहले ही वैदेही बोल पड़ी, " आबा! वज्र कसा आहे? " वज्र के पिता ने एक गहरी सांस ली और कहने लगे... "देवा ला साकड़ घाल पोरी! भगवान से प्रार्थना कर कि उसका दिल फिर से सामान्य रूप से धक-धक करने लगे...उसे प्राइवेट हॉस्पिटल में ले गया हूँ मैं.. देखते है.. जशी पांडुरंगा ची इच्छा!" मुश्किल से आँखों के आँसू छुपाने की कोशिश करते हुए वो चल पड़े!
पुरुषों को भी तो भगवान ने एक संवेदनशील दिल दिया ही होगा न? हम महिलाएं तो रो-रो कर, बोल-बोल कर अपना दिल हल्का कर लेती हैं फिर पुरुषों पर ए दबाव क्यों? मनोवैज्ञानिक परहेज, बंदिश क्यों ? 
वैदेही वज्र के खयालों में खोई ही थी कि माँ बोल पड़ी, "पोरी! नशीबवान तू!" वो विनय अभी भी कोमा में ही है ...बेचारा! न माँ-बाप पास में, न रिश्तेदार! कुछ समाजसेवी संस्था के लोग ही उसका खयाल रख रहें हैं.. चार दिन से वेंटीलेटर पर हैं...
वैदेही की आँखों के सामने उसका गोरा-चिट्टा चेहरा आता है और आँखों से पानीदार मोती बिखरने लगते हैं बिना रुके...कितना मिलनसार.. कितने सपने लेकर आया था वह नेपाल से यहाँ पढ़ने! 
तभी माँ उसके हाथ में पानी का ग्लास थमा देती हैं और नर्स ने निकाल कर रक्खी हुई दवाईयाँ! 
वैदेही फिर मन के क्षितिज को छूने का अट्टाहास करने लगी...ऊपरवाला भी इतनी आसानी से नहीं देता हैं खुशियाँ! पल भर के लिए सुनहरी धूप, इंद्रधनुष, रिमझिम बरसती फुहारें और अगले ही पल गरजते कजरारे बादल, रौद्ररूपधारिणी सौदामिनी और घनघोर बारिश..बेड के नीचे पड़े जूते देख कर उसकी नज़रों के सामने जूता लहराता, नाचता गाता यश आता है.. वह बतियाने लगती हैं खुद से ही... तन्हाईयों में...हम दोनों ही तो नाच रहें थे पीछे जिप्सी में... न जानें कैसा है यश... कल माँ कह रही थी उसके पैरों को गहरी चोटे आई हैं। कई जगह फ्रैक्चर हैं। हे प्रभु! कुछ पल की खुशियों की इतनी बड़ी कीमत... क्यों यह नाइंसाफी? 

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!

शेष कहानी अगले भाग में....

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