आचार्य श्री जी के मुखारविंद से जैसे ही साध्वी तेजस्विता जी का नाम साध्वीप्रमुखा के तौर पर जाहिर किया गया , सारा पंडाल ' हर्ष.. हर्ष' के नारों से गूंज उठा! सारा पंडाल ज्ञान-रश्मियों की जगमगाहट से आलोकित हो गया! आचार्य श्री जी के आदेश पर साध्वी जी उठ खड़ी हुई !
गुरु को वंदन कर सम्मान के प्रतीक स्वरूप शॉल को स्वीकार कर उन्होंने सभी का अभिवादन किया और सबकी विनती का मान रखते हुए साध्वी जी धाराप्रवाह बोलने लगी!
"उपस्थित सुधि श्रोताओं! मैं भाग्यशाली हूं की आज मुझे, एक अदना से दिए को यह अनुपम सौभाग्य प्राप्त हुआ कि मैं ज्ञान- सूर्य के सम्मुख मेरे विचार प्रस्तुत करने का बाल-अट्टहास कर रही हूं लेकिन आज 'मित्रता दिवस' पर मैं अपनी सांसारिक जीवन की सखी को जरूर याद करना चाहूंगी जिसके त्याग, प्रेम की वजह से आज का यह अध्याय मेरे जीवन गाथा में सुवर्ण अक्षरों से अंकित हो रहा है!
क्या जानना चाहेंगे मेरी सहेली के बारे में? मेरी जिंदगी के बुझते दीए को फिर से प्रज्वलित करनेवाली सहेली के बारे में?
ज्योति! मेरी बचपन की प्यारी सखी! मेरे दुःख-सुख की साथी ! कजरारे बादलों के बिच से झांकती सौदामिनी...मेरी जीवन-रेखा ! कच्ची उम्र की ज्योति के त्याग, समर्पण और अटूट प्यार का ही कमाल है कि आज मैं अपने बड़े लक्ष्य को प्राप्त कर पा रही हूं! जिस उम्र में किशोरियां अपने सपनों में सुकुमार राजकुमार की चाहत के सपनों को नवरंगों से सजाती हैं, अरमानों के रंग-बिरंगी फूलों से गुलदस्ते को सुरभित करती हैं उस उम्र में अपनी संयम की राह पर चल पड़ी सखी की जीवन डोर को टूटने से बचाने के लिए अपनी एक किडनी दान कर देती है! कितनी अद्भुत है मित्रता की यह मिसाल! आज के इस सम्मन की असली हकदार तो वही है! आओ! आगे आओ ज्योति! दुनिया को निहारने दो मानवता की इस तेजस्वी मूरत को "
पंडाल के कोने में साधारण साड़ी में लिपटी एक महिला सकुचाते हुए खडी हो गई! कैसे टालती अपनी सखी, साध्वी प्रमुखा का आदेश? कैसे निकल पाती मित्रता के उस तेजस्वी औरा से बाहर?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!