राम...

राम बसे मोरे मन मंदिर में जैसे दूध-शहद !

राम छवि मोरे मन दर्पण में जैसे पूनम-शरद!

कौशल्यासुत जन्मे अवध में, बजे ढोल-शहनाई!

सखी-सहेलियाँ ले बलैया, गायें मंगल गीत-बधाई!

 

लोग-लुगाई मनावे दीवाली, नाचे गायें,खेले इंद्रधनुषी होरी!

राजमहल की रंगत न्यारी, दशरथ अधीर सुनने किलकारी!

कौशल्या कक्ष पधारे भूपति,निरखन सूर्यवंश कोमल क्यारी!

 

आनंद उत्सव में मगन प्रजा-जन ,उल्हासित रघुकुल राजा!

वृक्ष-वल्ली-पशु-पक्षी-सृष्टि पुलकित, बजे अवधपूरी में बाजा!

 

बचपन बीता गुरुकुल आँगन में, गुरु वशिष्ठ शिक्षा-दीक्षा-निश्रा में!

विद्या, विवेक, विनय तेज भाल पर,रघुवीर श्रेष्ठ शिष्य, शूर-वीर!

 

गुरु आज्ञा से तोड़ शिव धनुष, जनकसुता का जीता कोमल मन!

बड़े-बूढों को नमा शीश ले आशीष, सियाराम चले अपने वतन!

 

देख सिया-राम-लखन दशरथ घर आनंद, अवधपुरी में परमानन्द!

नववधु सी सजी अयोध्या, घर-घर वन्दनवार, माण्डना, केसर गन्ध| 

 

कैकई हठ आगे विवश-अभागा दशरथ, लगा सूर्यग्रहण, 

मंथरा-मति से बुझा नन्दादीप, शापित दशरथ ह्रदय प्रण!

 

पितृ-वचन निभावन चले राम लखन सिया संग वनवास 

अयोध्या में घिर आई काली घटा, टूटी रयत की आस! 

राजपाट त्याग राम लखन विनवे केवट ले चल शरयु पार!

सियाराम-लखन चरणरज लेने उछली नदिया की पावन धार!

 

दशानन छल-कपट से आहत वनवासी लक्ष्मण-राम,

लक्ष्मणरेखा पार कर सिया ने, दिया निज सुख-विराम!

सत्य,न्यायप्रिय, मर्यादा पुरुषोत्तम सुधारें सुग्रीव-भाग, 

पवनसुत दे सन्देश सिया को लगाए लंका में आग!

 

अहंकार-ग्रसित दशानन, भुला नीति-ज्ञान!

परस्त्रीगमन आतुर, भुला सतित्व सम्मान!

महाबली कर पराजित, धर्म पताका फहराई,

रामसेतु पार कर राम ने पाप की लंका ढहाई!

 

राम नाम में सार हैं, भक्ति से भवसागर पार हैं!  

एकपत्नीव्रता राम है, मर्यादा पुरुषोत्तम सियाराम है!

 

शबरी के झूठे बोर की मिठास राम है, 

पाषाणवत अहिल्या की आस राम है!

जनकसुता की अग्निपरीक्षा राम है,

जन-जन का अटूट विश्वास राम है!

आत्मा में परमात्मा का वास राम है,

मुक्ति की अक्षुण्ण प्यास राम है!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|

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