मौन और उसका महत्त्व

किसी ने कहा है “मन तो है भिखमंगा ,सदैव माँगना ही है उसका धंदा” 

इस उक्ति से हमें क्या पता चलता है की, की हमारा मन सदैव किसी चीज की अभिलाषा करता रहता है । ऐसा क्यूँ होता है आप को पता है क्यों की हमारे मस्तिष्क में एक साथ कई सारे विचार आते है । जैसे कभी मुझे लगता है इतने विचारों की वजह से हमारी बुद्धि विपरीत दिशा में सोचने लगती है ।  आप ने बारिश के दिनों में देखा होगा की आकाश में बादल ही बादल छाये हो और आसमान में सूरज की किरणे हमें दिखाई न दे , तो ये सारे विचार इकठ्ठा हो होकर हमारी बुद्धि की जो प्रतिमा है उसे कम करते है ।  कभी कोई एक विचार कम हुआ तो आसमान की कोई छोटी परत हमें दिखाई देती है ।  उसी तरह जैसे जैसे विचारों का बोझ कम होता जाता है , वैसे वैसे सूरज की रौशनी हमें दिखाई देना शुरू होती है ।

अगर उदहारण के तौर पर देखा जाए तो तो जैसे एक प्याज को आप काटते है उसमे जैसी अनेक परते होती है उसी तरह एक इन्सान दिन भर में सारे विचार इकट्ठा करता है , परत दर परत विचार ही विचार जो उसका उम्र भर पीछा नहीं छोड़ते । मनोवैज्ञानिक कहते की कुछ लाखों विचार आप दिन भर में अपने मस्तिष्क में भरते हो,उसके संस्कार आप के ऊपर पड़ते है , आप जो पढ़ रहे उसका संस्कार,आप जो गीत गाते हो , आप दोस्तों से बात करते आदि ।  जो जरुरी नहीं होते संस्कार और विचार  उसे भी स्वीकार करते हो । जैसे कोई धूल का तूफ़ान आया हो तुम यात्री की तरह उसमे खो गए हो , तुम्हे कुछ दिखाई ही नहीं  दे रहा है , बस तुम अपने विचारों को देखते हो । हम हमेशा सोचते है कि हमारे जीवन में बदलाव क्यूँ नहीं आ रहा है , जिन विचारों को आप आत्मसाद कर चूके हो,वे आप का पीछा नहीं छोड़ते आप सोचते हो की नींद आ गयी है लेकिन उस समय आप का मस्तिष्क तो काम कर रहा है और वही धूल मिट्टी वाले विचार, जैसे नींद खुली वापस आ जाते है ।

ये जो इकट्ठी हुई विचारों की परते है इनके कारण हम आच्छादित होते है । इस आच्छादन को तोडना पड़ेगा ।  बुद्धिमान व्यक्ति को अगर इसे तोडना है वाक् आदि इन्द्रियों पर आप को नियंत्रण करना पड़ेगा और वह सीखना भी पड़ेगा ।  इसी लिए मौन का इतना महत्त्व बताया गया है ।

“मौन का अर्थ है आप बाहर और भीतर बोलना बंद कर दे “क्यूँ की बोलना बुद्धि की एक बहुत बड़ी प्रक्रिया है और इससे आदमी बहुत  कुछ इकठ्ठा करता है । और जो भी आप बोलते हो उसे सुनते भी हो ।  आप को पता ही नहीं चलता है की आप जो बार बार बोलते हो उसे सुनते भी हो, उसके संस्कार भी आप के ऊपर होते है । कोई व्यर्थ की बात जिससे किसी को लाभ भी नहीं हो उसे भी आप बोलते हो ।  अगर आप अपनी दिनचर्या का विश्लेषण करेंगे तो आप को पता चलेगा की ऐसी कितनी ही बाते है जो व्यर्थ है,कचरे के समान जो हमें बोलनी नहीं चाहिए थी । एक बात ध्यान रहे जिस बात से किसी को लाभ नहीं हुआ निश्चित ही उससे किसी को हानि हुई हो ।  आप ना केवल व्यर्थ के विचार अपने दिमाग में डाल रहे हो ,जो आप की बातें सुन रहा है ये कचरा उसके दिमाग में भी भर रहे हो । उसका कोई मूल्य नहीं है ।

सबसे पहला काम है की आप अपनी वाणी को सचेत करे , जो जरुरी है उतना ही बोले । व्यर्थ को न बोले इससे आप किसी मुसीबत या झंझट में पड सकते है ।क्यूँ की आप अकेले थोड़ी बोलते हो, जो सुनता है वो भी कुछ बोलेगा और ये सिलसिला ऐसा चलता जायेगा । आप कभी सोचोगे की अगर अप न बोलते तो कितने उपद्रवों से बच जाते । इसका कोई अंत नहीं है ।  ये दुनिया बड़ी शांत हो सकती है अगर लोग अपरिहार्य को छोडकर मौन रहते । इसलिए साधू  चूप हो जाते है , साधू उतना ही बोलते  है जितना अनिवार्य हो और जिससे किसी को लाभ हो , अन्यथा मौन रहते है ।

वाणी को बाहर से रोके तो विचार नहीं रुकेंगे जब तक आप विचारों को भीतर से ना रोके । क्यूँ की आप बाहर बात नहीं करेंगे लेकिन अपने आप से तो बात करेंगे और वही विचार फिर से मन में आते जायेंगे । बैठे हो, खुदी से बात कर रहे हो और आप का मन उसे गाढ़ा बना रहा है ।  इसलिए भीतर से भी शांत रहना सीखो , भीतर से भी न बोलो ।  वाणी बड़ा उपद्रव पैदा कर सकती है ,जरुरी नहीं लेकिन हमें नियंत्रण न हो तो ऐसा हो सकता है । धीरे धीरे भीतर भी चूप्पी साधों ,मौन को फैलने  दो । जितना जितना मौन फैलेगा उतना उतना आप का मन विसर्जित होना शुरू होगा । जैसे जैसे मौन घना होगा वैसे वैसे आप एक विलक्षण आनंद की अनुभूति करेंगे । सारे धर्मो का आधार ही मौन है ।  सभी संत और महात्माओ ने मौन को बड़ा ही महत्त्व दिया है ।  इस जगत में  जब भी सत्य का अवतरण हुआ है तब किसी ने भीतर से चूप्पी साधी हो, तब  दुनिया सब शांत हो । उस शांत क्षण में हमारी शक्ति और हमारा तालमेल इस ब्रह्माण्ड से हो जाता है । वो मौन का विलक्षण तीर हमें सत्य कीपहचान करवा सकता है । मौन में आदमी कोई भी कार्य पूर्ण होश पूर्वक करता है ।  इस लिए साधू को हमने मुनि कहा है । मुनि का अर्थ है जो मौन हो गया हो ,जो भीतर शांत और चूप हो गया हो । 

इस लिए मौन का महत्त्व समझे ।

                                                                                                                         सुशील जोशी


द्वारा SUSHIL JOSHI
Shared14 Jul 2025
Start 14 Jul 2025
End 14 Jul 2030
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