नारी, तू नारायणी! (प्रतियोगिता) शीर्षक : नि:शब्द पीड़!

शाल-श्रीफल, तमगों-तोहफों का, खुमार बाकी है।
मय जो चढ़ी शोहरत की , उतरनी अभी बाकी है।

ढलते सूरज संग 'नारी-सम्मान' अंधकार में गुम है।
'ढाक के तीन पात' सा शोषण, उत्पीड़न, गुमसुम है।

दरबारियों की कुत्सित हँसी बिच चीरहरण जारी है।
हर युग में पांचाली की नि:शब्द पीड़ बहु भारी है। l

अपनों में, अपनों के बिच अग्निपरीक्षा क्यों दे जानकी?
किसे फुरसत सती के आत्म -सम्मान, देह-भान की?

"बेटी बचाओ, बेटी पढाओ" किस-किस से बचायें बेटी को?
बागबान ही जब बेरहम, किस के भरोसे पाले उम्मीद को?

अंतरिक्ष में खोई 'कल्पना', कैसे सजाएँ जग में अल्पना?
लाखों 'सिन्धु' दर-बदर, कैसे पढ़ेगी बेटी कोमल मना?

भूल गएं क्या जिजाऊ के संस्कार, सिपाही-सालार शिवबा के?
दुश्मन सुभेदार की बहु पहुँचाए जो मान-सम्मान से।

धरती पुत्री जनसुता बच न पाई दम्भी दशानन से।
कैसे बचेगी कोमलांगी, दरिंदें के विद्रुप आनन से?

नारी!

खुद ही को कर बुलंद, स्व-सुरक्षा में हो निपुण।
दुर्गा, तू वीणावादिनी, ज्ञान-शक्ति का रूप सगुण।

नारी! तू नारायणी, आदिशक्ति तू, दुष्ट-संहारिणी!
जगत जननी, ब्रह्माण्डव्यापिनी, तू विश्व तारिणी!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र!







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