भाग ६६
देर रात सभी अपने-अपने घर पहुँच चुके थे। मित्र मण्डली को यहीं उम्मीद थी कि आज की भोर उदासीनता की कालिमा को दूर कर जीवन में नया उजाला भर देगी लेकिन जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हर बार होगा यह मुमकिन नहीं था।
वैदेही को आज ऑफिस जाना था। दो-तीन दिन घर से ही काम करना था तो उसका काम लैपटॉप पर जारी था। आज ऑफिस में आबा भी नहीं थे। आबा ने उसे ही सारी व्यवस्था सँभालने को कहा था। वह भी अभी-अभी प्रतिष्ठान से जुड़ी थी। उसे भी बहुत सी बारीकियाँ समझनी बाकी थी। वज्र का भी खयाल रखना जरुरी था। वह सही समय पर ऑफिस में पहुँच गई थी।
ऑफिस के कर्मचारी आबा के प्रशिक्षण की भट्टी में तप कर कुन्दन बने हुए थे। उनका व्यवहार सब के साथ सौजन्यपूर्ण था। समय की पाबन्दी और काम के मामले में आबा बहुत ही कड़क थे। वह कभी कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे लेकिन उनकी एक तिरछी नज़र ही काफ़ी थी कर्तव्य-बोध तथा अपराध-बोध के लिए।
आबा ने दिन-रात एक कर, सालों की मेहनत से खडी की थी यह कंपनी! हल जोतने से लेकर बुआई- कटाई तक का उन्हें अनुभव था। निर्यात के क्षेत्र में उतरने के बाद उनका कारोबार 'दिन दुगनी रात चौगुनी' तरक्की कर रहा था। अपनी मेहनत के साथ-साथ उन्होंने नविनतम तकनीकी ज्ञान को भी बागबानी में जोड़ दिया था। विभा को सासवड से आई अंगूर की पेटियों का हिसाब-किताब भी देखना था और उनकी एक्सपोर्ट के लायक पैकेजिंग करा कर, उसका सही वजन हैं या नहीं यह चेक कर आर्डर के हिसाब से माल को जहाज तक पहुंचाने से लेकर विदेशी ग्राहकों से संवाद बनाएं रखने तक का काम उसे देखना था।
वैदेही अपनी माँ के जैसी ही व्यवस्थापन के कार्य में माहिर थी। उसे अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहने का गुण अपने पिता से विरासत में मिला था। यहीं वजह थी कि आबा उसे उत्तरदायित्व सौंप कर निश्चिन्त थे। उन्होंने वक़्त की धूप में बाल सफेद किए थे। इन्सान की पहचान करने में वो अव्वल थे। जैसे एक गृहिणी चावल के एक दाने से पुरे के पुरे तपेले के चावल पके या नहीं इसका अंदाजा लगा देती हैं वैसे ही आबा एक काम को सौंप कर कर्मचारी की हैसियत का पता लगा देते थे।
जीवन में अनुभव का अपना महत्त्व हैं यह आबा जानते थे। वह यह भी जानते थे कि एक वक़्त युवा के जीवन में ऐसा भी होगा जब वह पहली बार काम से जुड़ा होगा। जब तक कोई उसे प्रशिक्षण, मार्गदर्शन तथा दिशा-निर्देश नहीं देगा, उसे अनुभव आएगा कहाँ से? इस के लिए ऐसे व्यक्ति का चयन जरुरी था जिसमें कुछ सीखने की ललक हो, मेहनत करने का जज़्बा हो, कार्य को पूर्णता तक पहुँचाने का धैर्य और निरन्तर प्रयास। आबा की पारखी नज़र कोयले की खदान से हीरा ढूँढ़ कर लाती थी और उसे तराशने का प्रयास करती थी। जन-कल्याण ही उनका अंतिम लक्ष्य था।
कृषिप्रधान इस देश में कृषि पर जिनकी आजीविका निर्भर हैं उनकी हालत सब से ज्यादा दयनीय क्यों हैं यह प्रश्न आबा को बार-बार कचौटता था। महाराष्ट्र जैसे समृद्ध राज्य में भी कृषक अगर आत्महत्या करने को मजबूर हो तो इसे क्या कहा जाय? आबा के मन में यहीं प्रश्न उठते रहते और वो इन सवालों के जबाब ढूंढने में व्यस्त हो जाते। नेता-अभिनेता-समाजसेवक चार दिन आ कर कभी झोपड़ी में किसी दगड़ा के हाथ का खाना खाते और फोटो खिंचवा कर चले जाते.. कभी वादें ही वादें तो कभी आश्वासनों की फेहरिस्त! जमीनी हकीकत वहीं की वहीं।
आबा चाहते थे इसका स्थायी हल निकले। लोगों कों खेती की विज्ञान-आधारित शिक्षा मिले, जमीन की उपजाऊ क्षमता और पैदावार में तालमेल हो, किसानों को कम दाम पर बीज,खाद तथा अवजार मिलें! उनकी खेती-बाड़ी सिर्फ वर्षा पर ही आधारित न हो बल्कि जल संचयन के प्रकल्प का क्रियान्वयन हो। आबा सिर्फ सोचते ही नहीं थे उसपर अमल भी करते थे। उन्होंने कई विद्यार्थियों को कृषि विद्यापीठ से ज्ञानर्जन करने में मदद की थी।
आबा ने कृषि शिक्षा के लिए अब विद्यार्थियों को बाबा के नाम से शिष्यवृत्ति देने का निश्चय किया। उन्होंने विभा को इस बारे में जानकारी इकठ्ठा कर संबधित सभी संस्थाओं को पत्र भेजने के लिए कहा। उन्होंने कुछ गावों कों प्राथमिक शिक्षा, स्वछता अभियान के लिए गोद लेने का प्रण लिया। वैदेही प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष रूप से इस काम में सहयोग कर रही थी।
कल के तनाव से मुक्त हो कर वज्र अब आराम कर फिर से तरोंताज़ा हो गया था। उसने कुछ समय तक टीवी पर खबरें देखी और फिर अस्तव्यस्त पड़ा अपना कमरा संवारने लगा। टेबल पर पड़ा अल्बम देख वज्र ने वैदेही को फ़ोन लगाया। वैदेही ने 'ऑफिस में हूं' कह कर फ़ोन कट कर दिया। वज्र मन ही मन मुस्कुरा रहा था। दुनिया बदल जाएगी लेकिन यह लड़की अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगी। 'ऑफिस अवर' में व्यक्तिगत बातें... न बाबा न।
वज्र की थकान उतर चुकी थी और वह खुद को तरों-ताज़ा महसूस कर रहा था। उसने छोटू को चाय बनाने को कहा और चाय पी कर वह ऑफिस की ऒर निकल पड़ा।
वैदेही की इसी सादगी, समझदारी तथा सौजन्य का वह कायल था। काम के प्रति उसकी निष्ठा देखने लायक थी। वज्र मन ही मन कह रहा था, " यूँही नहीं वह आबा की इतनी प्रिय है! है ही ऐसी वैदेही तपस्वी सी धीर-गंभीर, झील सी शांत।"
वज्र के आते ही सभी सजग हो गएं। वज्र ने केबिन में प्रवेश करते ही गुलाब की खुशबू से उसका मन प्रसन्न हो गया। ऑफिस की उसकी केबिन की साज-सज्जा का बदलाव उसे वैदेही के हाथों की किमया का अहसास करा रहा था। वज्र ने भी वैदेही को जोर का झटका धीरे से देने का मन बना लिया था उसने इंटरकॉम कर वैदेही को केबिन में बुलाया और आज के निर्यात के बिल, माल की डिलीवरी तथा शेष भुगतान की जानकारी ली। सारा काम बहुत ही साफ़-सुथरे और स्पष्ट तरीके से किया गया था। वज्र उसके काम से बहुत प्रभावित था। दोनों साथ-साथ पढ़ रहे थे लेकिन वैदेही की कार्यक्षमता की तुलना में वह बहुत पीछे था। उसकी वाजिब वजह भी तो थी। वज्र सोनेका चमच्च मुँह में लेकर पैदा हुआ था लेकिन वैदेही गोलियों की बौछारों के बिच में, नक्सल-बहुल इलाके में, घने जंगलों के बीच में पैदा हुई थी।
वज्र वैदेही कों बचपन से जानता था। वह यह भी जानता था कि वैदेही में वो चलाखी नहीं हैं जिससे वह चापलूस व्यक्तियों से निपट सकें। उसमें आज भी गाँव की मासूमियत, भोलापन और सबको अपने जैसा सीधा-सरल समझने का भ्रम जिन्दा था। इसी बात का उसे डर था। कभी-कभी ज्यादा शराफत भी इन्सान की कमजोरी बन जाती हैं यह वज्र जानता था। दुनिया में उन लोगों की कमी नहीं जो ईर्ष्यावश दूसरों की टांग खींचने में ही खुद को धन्य समझते हैं।
साढ़े चार बजे वैदेही को आबा विनायक राव जी का फ़ोन आया। आबा ने आज के काम का लेखा-जोखा लिया और अप्पा के भूमिपूजन कार्यक्रम की जानकारी ली। इसी रविवार को कराड में भूमि पूजन का कार्यक्रम था। आबा कार्यक्रम में जाना चाहते थे। उन्होंने विभा को वादा किया था। एक नेक काम की शुरुआत में वो कैसे पीछे रहते?
वो कराड के आसपास के गाँवो का भी जायजा लेना चाहते थे।
वैसे तो कराड, सातारा यह शक्कर सम्राटों का इलाका था। राजनीतिक हलके में भी इन लोगों की तूती बोलती थी। कृष्णा-कोयना के संगम से पावन यह रत्नगर्भा धरती सोना उगलती थी। पहले ही यहाँ किर्लोस्कर उद्योग समूह अपनी जड़ें जमा चूका था और फिर विकसित हुए सहकारी क्षेत्र के इन शक्कर कारखानों ने यहाँ एक तरफ युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराएं तो दूसरी तरफ यहाँ के खेतिहारों की आजीविका में अमूल-चूल परिवर्तन कर उन्हें समृद्धि और धन-धान्य-सम्पदा का वरदान भी दिया। यहाँ के जन-प्रतिनिधियों ने भी इस क्षेत्र के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया। कराड अब विद्या नगरी बन चूका था। संत गाडगे महाराज की प्रेरणा से शिक्षा क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव हुएं थे और यहाँ का युवा अपने ज्ञान और मेहनत के बल पर अपने साथ-साथ देश के विकास में भी योगदान देने लगा था।
अप्पा यशवंतराव स्वतंत्रता के बाद के युग का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्हें अपने पुरखों से राष्ट्रभक्ति और देश पर सरस्वती नौछावर करने का जज़्बा विरासत में मिला था।आबा भी उनसे जुड़ना चाहते थे। दोनों की राहें एक ही मंजिल की तरफ बढ़ रही थी। दोनों के मन में लोक कल्याण की भावना हुलारें ले रही थी। आबा चाहते थे समाज कल्याण को समर्पित दो नदियों का संगम जिससे इर्द-गिर्द का इलाका सुजलाम्-सुफ़लाम् हो।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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