महासती चन्दनबाला!

नमन माँ शारदे! 🙏🙏🙏

आंजनेय/हनुमत छन्द!

 

अजब नियति का यह लेखा।

राजकुँवर-छल, दासी देखा।।

शरणागत माँ शरीर त्यागा।

वसुमति कर्म-भोग है जागा।।

 

हाट-हाट बिक रही अभागी।

गणिका अतिशय बोली दागी।।

वसुमति अंतस की है जाणी।

ऋजुल वैश्य धनवाह सु-वाणी।।

 

तात-मात से हर्षित ललना।

दिव्य रूप की सुन्दर रचना।।

मात मुला मन शंका पलती।

पावन बन्धन धूली मलती।।

 

देख योग वह मत्सर मारी।

कपडे-गहने लेकर सारी।।

केश काट दे वसन पुराने।

वसुमति रखती तहखाने।।

 

बंधी साँकल से है वसुमति।

निकली भार्या करके दुर्गति।

नौकर-चाकर छुट्टी दे कर।

चाबी लेकर चल दी बाहर।।

 

आह पिता चंदन सुन रोए।

देख सुता को सुध-बुध खोए।।

निराहार कृश चंदन बाला।

दे कर बांकुले खोलत ताला।

 

कारीगर बुलवाने निकले।

कौशाम्बी जन किस्मत बदले।।

महावीर कर विहार पधारे।

छ माह में दिन पंचम टारे।।

 

वीर पारणा हित व्रत ध्यावे।

विचरण करता भिक्षा पावे।।

खड़ी बांकुला सब गुरु देने।

नैन अश्रु मन उलाहने दे।।

 

महावीर के व्रत पूरे सारें।

उड़द बांकुला अब स्वीकारें।।

कर्म बंध अब टूट गया है।

भाग्य दीप अब आलोकित है।

 

धन-धन चंदन बाला प्यारी।

साध्वी प्रमुखा अदभुत न्यारी।।

सती वृन्द की शोभा अनुपम।

जिनवाणी का न्यारा परचम।।

 

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

 

 

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