ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ४९
भाग ४९

परमपिता परमेश्वर की इच्छा समझ विभा और यश ने स्वयं को नये परिवेश में ढालने की कोशिश शुरु की मानों आँगन में तेज आँधियों में लड़ते-लड़ते अपना अस्तित्व बचाता गुलमोहर! वसंत का इंतजार आज भी था सिर्फ थोड़ा सा धीरज जरुरी था! 
जैसे स्वयं का शरीर भी नयी चीज को स्वीकार करने के लिए वक्त लेता है वैसे ही मन भी नयी परिस्थितियों से तालमेल बैठाने के लिए वक्त मांगता है!
विभा और यश साथ-साथ निकल पड़े नितीन सर के घर की ओर एक नए अध्याय के शुभारम्भ के लिए! 'ओला' हवा से बातें कर रही थी और विभा यादों की भूल-भुलैया में खो चुकी थी तभी यश बोल पड़ा, "विभा! इस बार एकल स्पर्धा में तुम्हें सुवर्ण पदक लेना ही होगा! सुना तुमने! ये छोटे शिशु से हाथ-पैर पटक कर रोना-धोना बंद करो और लक्ष्य का पीछा शुरू करो... अभी और इसी पल से! अब हमें आपस में प्रतिस्पर्धा करनी होगी। कौन ज्यादा से ज्यादा मेडल हासिल करता है, देखते है। आखिर मेरी 'झाँसी की रानी' में ज्यादा दम है कि मुझ में यह आजमाना ही होगा न! चैलेन्ज मंजूर है मेरी मिस यूनिवर्स?

विभा खिलखिला कर हंसने लगी मानों अभी-अभी सूर्य-ग्रहण ख़त्म हुआ हो और आसमान में छाया कोहरा छंट गया हो! प्रकृति के भाल पर सूर्य ने कुंकुम तिलक किया हो और सूर्य देवता पृथ्वी-लोक पर अपनी आभा बिखेर रहे हो! विचारों में भटक रही विभा को जोर का झटका महसूस हुआ और एक घर के सामने 'ओला' रुक गयी! विभा और यश नितीन सर के घर के सामने पहुँच चुके थे।
नितीन सर का घर एक पारंपरिक संयुक्त परिवार का अद्भुत उदाहरण था! घर में उनके माता-पिता, दो छोटे भाई-बहन और उनकी पत्नी! एक हँसता खेलता परिवार जिसके सभी सदस्यों के चेहरों पर मानों खुशियों ने बड़े ही दिल से हस्ताक्षर किये हो! नितिन सर के माता-पिता ड्राइंग रूम में आएं और बच्चों से मिल कर प्रसन्न हुएँ! यश और विभा ने चरण स्पर्श कर बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया। पढ़-लिख कर भी यश और विभा आधुनिकता की चकाचौध में भारतीय संस्कृति की तेजोमय परंपराओं को नहीं भूले थे! वरिष्ठ जनों के आशीर्वाद का मोल वह बखूबी जानते थे! भारतीय संस्कृति में पारिवारिक संबंधों की ऊर्जा और उज्जवलता को वो बखूबी जानते थे। रिश्तों की मजबूत जमीन पर खड़ा वृक्ष ही गर्दन ऊँची कर आसमान को निहारने की क्षमता रखता है यह वह जानते थे! जडें मजबूत हो तो झंझवातों से क्या डरना! जमीं से उनका जुड़ाव ही उनकी ताकत थी!   

तीनों दीवानखाने में बैठ बातें करने लगे | उन्होंने लखनऊ अकादमी में बैडमिंटन की चयन प्रक्रिया के लिए आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए निर्धारित तारीख पर लखनऊ पहुंचने का कार्यक्रम बनाया था और विचार-विमर्श के लिए दोनों को आज बुलाया था! खेल के लिए उन्हें दोनों को कुछ खास बातें भी समझानी थी!

नितीन सर ने दोनों के लिए चाय-बिस्कुट मंगवायें और बातों का सिलसिला शुरू हुआ! उन्होंने यश को सर्वप्रथम बधाई दी और और उसके जज्बे, जीवट और जद्दोजहद के लिए उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा भी की! नितीन सर का हर एक शब्द अनुभव की टंकसाल से निकला सुनहरा सिक्का था जिसे संजो कर रखना जरुरी था। दोनों प्रशिक्षार्थी ध्यान लगाकर सुन रहे थे! गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा, अमिट विश्वास बहुत जरुरी होता है किसी भी विषय में प्रावीण्य पाने के लिए! हम किताबों से , सोशल मीडिया से, व्हाट्सएप से ज्ञान तो प्राप्त कर सकते हैं लेकिन सही ज्ञान हमें उन्हीं से मिल सकता है जिन्हे उस क्षेत्र का अच्छा-खासा अनुभव हो क्योंकि वो उन बारीकियों को जानते हैं जिसके सहारे एक खिलाड़ी अपनी हारी हुई बाजी को जीत का सेहरा पहना सकता है, खुद को औरो से अलग और विशेष साबित कर सकता है और अपने प्रतिद्वंदी को चारों खानें चित कर सकता है! अनुभव के बोल खिलाड़ी को अवसाद के पलों में हौसला देते है और कठिन परिस्थितियों से बाहर निकालने का मार्ग दिखाते है मानों खदान की अँधेरी गुफा में फंसे मजदूरों को बाहर निकलने का संकरा लेकिन उजला रास्ता!

नितीन सर ने यश से फिर से बात की क्योंकि वो जानते थे कि सिर्फ बड़ी-बढ़ी बातें करने में और हकीकत में गंगा धरा पर उतारने के लिए प्रयास करने में बहुत फर्क होता है! यश जैसी स्थिति में पहले तो मन की शक्ति, जीवट जरुरी होती है, फिर निरंतर कोशिश! बहुत कुछ शांत मन से सहने-सुनने की शक्ति के बिना बन्दा आगे बढ़ ही नहीं सकता! दिव्यांग खिलाडियों के लिए विशेष कर नकारात्मक दृष्टिकोण से निजात पाना मुश्किल मगर अति-आवश्यक हो जाता है! 

नितीन सर ने यश से बात कर उसकी मानसिक दृढ़ता का अंदाजा लिया और जब वो खुद आश्वस्त हुए तब उन्होंने गौरव सर को फ़ोन लगाया और यश के बारे में बात की!
शनिवार के दिन नितीन सर और यश का लखनऊ जाना निश्चित हो चूका था और दोनों की फ्लाइट की टिकट भी बुक कर दी गई !

नितीन सर ने विभा से भी खुल कर बात की ! उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अब पूरी क्षमता से अपने खेल को निखारना होगा! पार्थ के जैसे ही अब सिर्फ मछली की आंख पर ही नजर केंद्रित करनी होगी! सफलता की वरमाला पहननी है तो कोशिशों का कारवां सजाना होगा! विभा को नितीन सर अच्छी तरह जानते थे कि विभा बहुत ज्यादा संवेदनशीलशील है और वह मानसिक रूप से यश के बहुत करीब है। दोनों एक-दूसरे की ऊर्जा है एक-दूजे के पूरक हैं पर्याय नहीं ! 

नितीन सर ने उसे समझाया कि दोनों में माँ भारती को गौरवान्वित करने का माद्दा हैं, अद्भुत क्षमता हैं और वो उसे जाया होने नहीं देंगे! दोनों को सिर्फ और सिर्फ अपने खेल पर ध्यान देना होगा! बैडमिंटन कोर्ट में खिलाडी के उतरने के बाद उसकी शारीरिक और मानसिक एकाग्रता का बहुत महत्व होता है! उन्हें पता था कि वक्त बहुत कम है और दायित्व बहुत बढ़ा, मुश्किल लेकिन मुमकिन! एक तरफ पढ़ाई का बोझ और दूसरी तरफ खेल की तैयारी! समय का प्रबंधन करना होगा! कुछ दिनों के लिए बाकी सभी प्राथमिकताओं को एक तरफ रख कर खेल को वरीयता देनी होगी! राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव का मतलब है तगड़ी चुनौती! चट्टानों से टकराना है तो तैयारी और दमखम भी तो वैसा होना चाहिए न! नितीन सर ने यश से भी बातचीत की। वो यश से भी जानना चाहते थे कि विभा के साथ कौन सा खिलाडी सही तरीके से युगल स्पर्धा में खेल सकता है! विभा से भी राय ली गयी! 
सभी ने एक आवाज में वाणिज्य की प्रथम वर्ष में पढ़नेवाली नयी खिलाडी वीणा का नाम लिया! यश और विभा भी उसका खेल देख प्रभावित हुए थे! उसका दमखम जबरदस्त था और वह शॉट्स भी बहुत सटीक और ताकतवर लगाती थी! 

युगल टीम में वरीयता सूची में अग्रणी रहना हैं तो दो खिलाडी ऐसे होने चाहिए जो एक-दूसरे से बेहतर तालमेल कर सकें तथा एक-दूसरे की कमियों को अपने खेल से पाट सकें ! दोनों खिलाड़ी एक-दूसरे के जब पूरक होते है, एक-दूसरे को सँभालने की क्षमता रखते हैं तो टीम सशक्त हो जाती है यह वह जानते थे! विभा का भी ध्यान इस तरफ गया था क्योंकि वह भी अनुभवी खिलाडी थी, दो बार की बैडमिंटन खेलों की राष्ट्रीय विजेता थी !

भविष्य की योजनाओं की रूपरेखा तैयार हो चुकी थी! अब सिर्फ उसपर अमल बाकी था! विभा और यश नयी ऊर्जा से ओतप्रोत सर के घर से निकले और चल पड़े वज्र के यहाँ! विभा ने वैदेही को भी वज्र के यहाँ बुला लिया था! खेल का प्लान तो बन चुका था और अब वैदेही के दिल्ली जाने का प्लान भी तो बनाना था! कई दिनों बाद आये इस गर्व के क्षण को यादगार भी तो बनाना था!
जानकी जी और वैदेही की फ्लाइट की टिकट तो भारत सरकार की और से आ चुकी थी लेकिन मित्र-मण्डली चाहती थी कि वो भी कार्यक्रम में शिरकत करें! वैदेही के साथ एक व्यक्ति को साथ रहने की व्यवस्था तथा कार्यक्रम में लाने की अनुमति थी और अतिथि के रूप में उनके साथ इक और व्यक्ति जा सकता था ! लेकिन जाना तो सभी चाहते थे! विभा ने अपने पिताजी को फ़ोन लगाया और उनसे अगर हो सकें तो दो टिकट की व्यवस्था कराने के लिए कहा!

वैदेही बहुत खुश थी ! मित्र-मंडली के किस्मत के सितारें बुलंद थे! अप्पा की पहचान से कार्यक्रम में दो और लोगों के वहां उपस्थित होने की व्यवस्था हो गई और सभी ने 'शुभस्य शीघ्रम' का अनुसरण करते हुएँ उसी फ्लाइट में अपनी टिकट भी बुक करा दी थी।

दुर्घटना के बाद का यह पहला अवसर था जब पूरी युवा ब्रिगेड किसी दूसरे शहर में साथ-साथ घूमने जा रही थी !
परिंदों को नया आकाश मिल गया था विचरण करने के लिए! वो अंतरिक्ष की टोह लेना चाहते थे! आकाशगंगा के रहस्यों को जानना चाहते थे ! पंखों को फैला कर नयी ऊंचाइयां छूना चाहते थे ! दिलों का बोझ उतार फेंक आसमान की निलाई में खो जाना चाहते थे ! 

परमपिता परमात्मा ने एक अद्भुत मौका दिया था सबको!
सभी भविष्य के सपने बुनने में लग गएँ...कोई रंग-बिरंगे धागों से, तो कोई सूती, रेशमी, जरीवाले धागों से ! 
महाविद्यालय के प्राचार्य से लेकर सभी प्रोफेसर भी उन्हें हर संभव सहायता दे रहे थे ! उन्होंने सफर में ऑनलाइन क्लासेज की सुविधा प्रदान कर दी थी ताकि उन्हें किसी भी प्रकार की असुविधा न हो और पढ़ाई में वो अपने सहपाठियों से पीछे न रहें ! 

अब तक महाविद्यालय का प्रशासन उनकी अद्भुत कार्यक्षमता से परिचित हो चुका था! महाविद्यालय के प्रशासन की संवेदनशीलता ने उनके हौसलों को बेमिसाल अग्नि-पंख लगा दिए थे ! एक तरफ कॉलेज का नाम ऊंचा करने का जुनून और दूसरी तरफ अपार कष्ट झेलने के साहस ने उन्हें सबका चहेता बना दिया था! कई मौकों पर उन्होंने उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप सफलता भी हासिल की थी! वो जानते थे 'दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए' मित्र-मंडली को खुद में पूरा विश्वास था और ऊपर वाला भी उनकी नेक-नियत से परिचित था और इसलिए विपरीत परिस्थितियों में भी उनका जमकर साथ देता था!
वक़्त की कंटीली झाड़ियों और घने जंगलों में जंगली और हिंसक जानवरों के बिच रह कर वो दुनियादारी और वक्त के मिजाज को जान चुके थे और उनकी जीवट, जिद्द ने उन्हें वक्त की भट्टी में तपा कर कुंदन बना दिया था!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में....


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