वाकिफ नहीं हूं इस मन से
कहीं ठहरता नहीं, न ठहरने देता
सोचता भी हूं तो इस मन से
न कुछ करता है न हीं करने देता।
कहता है कि मुझे खुश रखो
और तरीके स्वयं ही बताता है
कहता है तू मेरा गुलाम है
और सारा दिन मुझे ही सताता है।
मैनें सोचा अपने ही इस मन से
कि ऐसा मैं क्या कर जाऊं?
जिससे इसको बुरा भी न लगे
और इसका मैं दोस्त बन पाऊं?
मन ने तुरंत जबाब दिया—
या तो तू काम कर या करने दे मुझे
मैने सोचा यदि मैं काम करूं तो
इससे अच्छा क्या होगा मुझे..
मैं तो चाहता ही यहीं हूं कि
मैं काम करूं और तू सहयोग कर
अच्छा ही हो यदि हम दोनों व्यस्त रहें
मैं कर्तव्य करूं और तू मार्गदर्शन कर।
आज हम दोनों ही खुश है
हमने एक दूसरे को अपना लिया
मन को खुशी मिल गयी
मुझे जीने का सहारा मिल गया।
-KAPIL TIWARI