पगलाई घटाएँ बरस रही थी और माँ थी कि रट लगाएं बैठी थी, 'बेटा! छतरी लेकर जाना.. स्कूल'...अब माँ को कौन समझाएं? पहली बारीश में वो मिट्टी की सौंन्धी-सौंन्धी खुशबू, बूँद-बूँद से तन-मन को रोमांचित करती फुहारें, पानी में झपाक-झपाक कर चलने का मज़ा और भीग कर परिंदों के पंखों सा बालों को झटकने का आनन्द ही कुछ और होता है.. हरियाली धरा, रिमझिम बरसता पानी, बादलों की गड़गड़ाहट के बिच चमकती सौदामिनी... मन में सरसरी पैदा करती हवा के बीच ओले बरसाती प्रकृति का अंदाज ही कुछ निराला होता है।
यहीं तो ठा हमारी खुशियों का खजाना! बचपन की मासूमियत, भोलापन! बस्ते को प्लास्टिक का आवरण चढ़ा कर बिनधास्त भीगते थे हम! जगह-जगह अपना साम्राज्य स्थापित कर चुके बारिश के पानी में 'छयी-छप्पा.. छई ' करने का मजा ही कुछ और था!
माँ की छाती से चिपके नन्हें शिशु से, बदन को चिपके गीले कपडे, बालों सें झरता पानी, चेहरे से लुढ़कती बुँदे, होठों को चूम हौले से मुँह में प्रवेश करती इक्का-दुक्का बुँदे और मदमस्त करती शीतल बयार... प्रकृति का यह मादक स्पर्श ही काफ़ी था मस्तमौला जीवन के लिए!
घर लौटते ही माँ की चिंता बढाती, बार-बार आ-आ कर घर की शान्ति भंग करती तथा माँ से चुगली करती झींकें हमें अपराधी सा माँ के सामने खड़ा करती और माँ...प्यार से डांट कर गीले कपडे बदलने को कहती! हम हालात का जायजा ले कर दूम दबा कर भाग जाते शैतान बच्चे से...कमरे में कपडे बदलने के लिए।
एक तरफ गैस के चूल्हे पर अदरक, दालचीनी, हरी घास की पत्तियाँ, इलायची सब डाल कर माँ जल्दी-जल्दी चाय चढ़ा देती और दूसरी तरफ चूल्हे पर पकौड़े तलने के लिए तेल की कढ़ाई चढ़ा देती! अक्सर बरसात में जब सब भीग कर आते तो माँ मीठे गलगले और गुड़ की पेज बना देती ताकि हमें सर्दी जुकाम न हो। हमारी 'फैमिली डॉक्टर' तो वहीं थी न!
आखिर बारिश और माँ के प्यार की नमी में भीगने के बाद ही इन सभी व्यंजनों का सही लुत्फ़ उठा सकते हैं हम!
अहा.. हा.. हा! क्या मज़ा आता था गरमा गर्म गुड़ की पेज की भाँप लेते-लेते घूंट-घूंट पीने का!
माँ त्रासदी को उत्सव बना देती थी अपने प्यार और कौशल से! एक तरफ अपने बच्चों की चिंता में उसका क्रोधित हो कर चिल्लाना और दूसरी तरफ मौसम के अनुकूल उनके लिए तरह-तरह के व्यंजन बनाना..प्यार, चिंता और क्रोध का अनोखा त्रिवेणी संगम!
हम सभी भाई-बहन एक-दूसरे को चिढ़ाते-चिढ़ाते, हंसी-ठिठोली करते-करते, लड़ते-झगड़ते, मिल-बाँट कर खाने का मजा लेते तो दूसरी तरफ चूल्हे की गर्मी से माँ के पसीने छुटते!
आज छोटी-छोटी खुशियाँ, खिलखिलाती मुस्कुराहटे, माता-पिता का प्यार... ढूंढ़ते रह गए हम.. 'हम दो, हमारा एक' वाले एकल परिवार में.. इंटरनेट की आभासी दुनिया में...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।