कमलदल पर लिख-लिख भेजू पाती यौवन की!
निर्मोही! प्रेम में ठुकराना मत अर्जी जीवन की!
आँगन की मुरझायी तुलसी,
जूही कड़ी धूप में झूलसी!
आँसू बहा रहा पारिजात,
बाँट जोह रहीं विरहनी दिन-रात!
पंखुडियों पर लिख-लिख भेजू पाती प्रीत की!
बेदर्दी! कब लौटोगे सीमा से रण जीत जी?
कुहूंके कोयल आम्र वृक्ष पर,
आम्र मंजरी बोहराई डाल पर।
चंपा, चमेली पूछें कुशल-क्षेम। झूमेंगे कब डाल-डाल पर परिंदे नित-नेम ?
मेहंदी से लिख-लिख भेजू पाती स्नेह की!
बेदर्दी! कब बरसेगी मन-आँगन फुहारें नेह की?
देहरी पर बिखरी हैं कलियाँ,
बहना ढूंढे सुनी-सुनी गलियाँ !
कैसे जताऊं राखी पर हेत?
वीरा! तुम बिन कैसे जलाऊं ज्योत स्नेह की?
लहूँ से लिख-लिख भेजू पाती समर्पण की!
बेदर्दी! तुम बिन कैसे करूँ वंदना मातृभूमि की ?
आँसू सूखे बूढ़ी अखियों के।
दीप बुझ गये सब उम्मीदों के!
सुनी आँखें तरसे अब के,
कब होगे दीदार वीर-जाँबाज पुत के?
थकी ऊँगलियाँ लिख-लिख पाती प्रेम की!
ढ़ाई आखर प्रेम का भड़काएं आग विरह की!
शिशिर की सर्द रैन सुलगाएं शोले,
टुहुँका कर-कर मोर अंगार घोले ,
सीमा प्रहरी दुश्मन की आंते खोले,
कैसे कहूँ पिया मोसे काहे न बोले?
कमलदल पर बिखरें आँसू लड़ी मोतियन की।
बेदर्दी! ठुकराना मत अर्जी सावित्री की।
आँसू पी-पी अखियाँ पढ़ रहीं पाती जज़्बात की!
रीता स्नेह, फड़फड़ाती रहीं लौ जीवन-दीप की!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।