ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ५९
भाग ५९

खरीददारी कर विभा और वैदेही आत्मसंतुष्टि से घर लौट चुकी थी। विभा ने वैदेही को घर के बाहर छोड़ा और वह अपने घर की ऒर चल पड़ी! घर का दरवाजा खुला देख वह हक्की-बक्की रह गई। तभी लाली को देख वह समझ गई कि अप्पा आए है। वह फुर्ती से दीवाणखाने की ऒर बढ़ी! सोफा पर बैठ कर अप्पा यशवंतराव जी तथा पद्मावती जी चाय पी रहे थे। साथ में बिस्किट भी एक-एक करके मुँह में डाल रहे थे। फ्रीज से दूध निकाल कर लाली ने तीनों के लिए चाय बना ली थी। अब विभा  के लिए वह चाय बनाने रसोई में चली गई और रात के खाने की तैयारी करने लगी। एक-दो फ्रीज में रखी सब्जियाँ निकाल उन्हें वह साफ़ करने लगी। 
विभा ने आप्पा और आई को प्रणाम किया और दो पल विश्राम कर वह बातें करने लगी। तीन-चार दिन से अकेली उसका मन नहीं लग रहा था। लाली भी नहीं थी वरना थोड़ा उससे बातें करने, उसे पढ़ाने-लिखाने में उसका समय चला जाता और उसे अच्छा भी लगता। 

लाली चाय और बिस्कुट लेकर आई और, "कश्या आहात ताई " कह कर फिर रसोई में चली गई। विभा ने लाली को, " बरी आहे गं मी " कह कर जबाब दिया और फिर आई-अप्पा से बातें करने लगी!

अप्पा का मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल बनाने का सपना अब धरातल पर उतरने को बेताब था और दोनों इसी सिलसिले में मुम्बई आएं थे। उन्होंने इसी रविवार को हॉस्पिटल के भूमिपूजन का मुहूर्त निकाला था और करीब-करीब सौ अपने आप्त-स्व-जनों, हितचिंतकों-स्नेहीजनों को इस कार्यक्रम में उपस्थित रहने के लिए आमंत्रित करने का निश्चय किया था। आमंत्रितों की सूची में अप्पा के नए-पुराने जनप्रतिनिधि-नेता मित्रगण, नामीगिरामी उद्योगपति, चिकित्सक, वास्तुकार, वकील और रिश्तेदार शामिल थे। उन्हें सभी को निमंत्रण भी देना था और शुभ कार्य को आगे बढ़ाने के लिए सबका सहयोग भी लेना था।

विभा को बहुत दिनों के बाद आज कुछ अच्छा महसूस हो रहा था। अप्पा के इस पावन कार्य में वह भी अपना योगदान देना चाहती थी। विभा समझ गई थी ज़िन्दगी का एक-एक अनमोल पल अपने दुखड़े रोने के लिए नहीं बल्कि औरों के दुखड़े दूर कर ख़ुशियाँ पाने के लिए हैं। वह समझ चुकी थी कि उपरवाले ने जो ज़िन्दगी की नेमत दी हैं उसका रचनात्मक उपयोग करना हमारे हाथ में हैं। विभा बार-बार शाश्वत सत्य को समझने का प्रयास कर उसे अपनाने का अट्टाहास भी कर रही थी। उसने हॉस्पिटल के लिए दान इकठ्ठा करने का काम अपने जिम्मे ले लिया था। अप्पा भी बहुत खुश हुए कि उनकी बेटी ने इस नेक काम में गिलहरी का योगदान करने का प्रण ले लिया है। 

आज कई दिनों बाद विभा चैन की नींद सोई थी! उसे अब धुप्प अँधेरे में भी अपनी मंजिल नज़र आ रही थी क्योंकि उसके अंतर्मन में चेतना का दीप प्रज्वलित हो चूका था। अप्पा और पद्मावती जी भी तैयार हो चुके थे बाहर जाने के लिए। उन्होंने आबा को फ़ोन कर उनसे मिलने की इच्छा जताई थी! अप्पा ने विभा को जाते-जाते कॉलेज छोड़ दिया और वो आबा विनायकराव जी को मिलने उनके घर पहुँच गएं। 

वज्र कॉलेज जा चूका था। घर में सिर्फ आबा, छोटू और अन्नपूर्णा ही थे। अप्पा और पद्मावती जी आबा से बातें करने लगे। उन्होंने कॉलेज के ट्रस्टियों को भी भूमिपूजन में आमंत्रित करने की इच्छा जताई तो आबा ने भी उन्हें सहयोग देने का विश्वास दिलाया। यह महज संयोग ही था की आज ही आबा की उनके साथ मीटिंग थी। आबा ने फ़ोन कर उन्हें इस नेक काम की जानकारी दी तथा उनसे मिलने की अनुमति मांगी। अध्यक्ष जी ने ख़ुशी-ख़ुशी इसे स्वीकार किया और अप्पा से बात कर उन्हें भी आमंत्रित किया। आबा बहुत खुश थे कि विभा के अभिभावकों ने इस शुभ कार्य के लिए उन्हें भी आमंत्रित किया। चाय- नाश्ता, मान-मनुहार की औपचारिकता पूरी कर सभी कॉलेज के संगोष्ठी-विचार-विमर्श हॉल की ऒर बढ़े। 

अप्पा और पद्मावती जी ने सपरिवार भूमिपूजन कार्यक्रम में उपस्थित रहने के लिए सभी ट्रस्टियों तथा कॉलेज के प्रिंसिपल साहब को निमंत्रण दिया और सब को कराड पधारने की विनती की। सभी ने अनन्त शुभकामनाएं दी और आने का वादा किया। आबा ने दोनों को भोजन के लिए रुकने की विनंती की लेकिन दोनों ने समय अभाव की बात कही और निकल पड़े मंत्रालय की ऒर। वहाँ अप्पा को शहर के प्रतिष्ठित भद्रजनों को नौता देना था।

कॉलेज के सभी पीरियड्स खत्म होते ही विभा मित्र-मण्डली की रोज की जगह पहुँच गई, गुलमोहर तले।
हवा के झोंकों से गुलमोहर के फूल-पत्ते बिखर रहे थे और सारा आँगन लाल पंखुड़ियों से पटा पड़ा था। वज्र-वैदेही विभा का ही इंतज़ार कर रहे थे। विभा आ कर बैठी ही थी कि यश का फ़ोन आया। उसने फ़ोन स्पीकर पर कर दिया था। विभा ने फ़ोन उठाया और बोल पड़ी, "हेलो! " यश बोल पड़ा, "नाश्ता नहीं किया क्या? इतनी धीमी आवाज़? क्या भूख-हड़ताल पर हैं मेरी ब्यूटी क्वीन?" 
सब हँसने लगे! यश ने फिर पूछा, "अच्छा! तो सबके सब वहाँ मजे कर रहो हों मुझें अकेला छोड़ कर... बहुत नाइंसाफ़ी हैं यारों! " फिर एक बार सब जोर-जोर से हँसने लगे! 
"वज्र! कैसी हैं मेरी दुखियारी रानी ? " सब फिर हँसने लगे! वज्र ने फोन हाथ में लिया और बोल पड़ा, " 'क्वीन ऑफ़ मित्र-मण्डली' इज फाइन! तुम बताओं! तुम्हारा क्या हाल हैं? कुछ खाने-पीने को देते भी हैं यह घाँस-फूंस ही हैं नसीब में?" सब फिर हँसने लगे। " यार! तुम लोगों को मिस कर रहा हूं यार! स्पेशली...'काली मैया कराड वाली' को!"
पूरा आसमन्त कहकहों से गूंज उठा। "चलों! बाय-बाय! प्रैक्टिस के लिए जाना हैं। " यश ने फ़ोन कांट दिया था। 

विभा आज मूड में थी। फलक पर घने कारे बादल छट गएं थे और सूरज ने दरख़्त के पीछे से झाँकना शुरू कर दिया था। सुनहरी धूप मन मोह रही थी। विभा ने अपने डोनेशन कैंपेन की सबको जानकारी दी। सभी बहुत खुश हुएं और सभी ने अपने एक-एक हज़ार रुपएं के योगदान से शुरुआत की। विभा ने यश को भी इस अभियान की जानकारी दी। उसने भी अपने योगदान को G Pay के माध्यम से तुरंत विभा के खाते में जमा कर दिया तो वैदेही और वज्र ने रोख रकम दे दी।  मित्र-मण्डली ने विभा को सहयोग देने का वादा किया। विभा को इस कार्य से बहुत सुकून मिल रहा था। अच्छे कार्य का तन-मन पर प्रभाव भी शायद अच्छा ही होता हैं। विभा के संतोष से भरे मानससरवर में उम्मीदों के कमल खिलने लगे, पथिक को लुभाने लगे! 

समय का प्रबंधन तथा व्यवस्थापन करने में मित्र मण्डली अव्वल थी। सभी ने एक घंटा लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ाई की और बाद में सभी अपने-अपने घर की ऒर चल पड़े। विभा को आज शाम को बैडमिंटन की प्रैक्टिस के लिए भी जाना था। वैदेही को परसों कंपनी में ज्वाइन होना था। परीक्षा भी नजदीक आ चुकी थी। वक्त तो मानों हाथों से रेत सा फिसल रहा था और मित्र-मण्डली उसे समेटने-सँभालने में लगी हुई थी।

विभा का अभ्यासक्रम विशाल था। ज्ञान के असीम समंदर से मोती ढूंढने थे लेकिन उसे साहित्य में गज़ब की रूचि थी। पढ़ना उसका जुनून था। उसके लेखन में उसके विशाल ज्ञान-सरिता से भरे अमृत कलश के दर्शन होते थे। उसकी कलम का जादू ही था जो सीधा समाज की विषमताओं तथा शोषण को रेखांकित करता था तथा उस फासले को मिटाने के सुझाव भी देता था। उसकी कलम सीधी पाठक के दिल को छूँती थी!

वज्र और वैदेही दोनों का पाठ्यक्रम वाणिज्य तथा व्यापार जैसे रुक्ष विषय से जुड़ा हुआ था। यहाँ लहलहाते खेत नहीं धान की पैदाइश के बाद उसे सही तरीके से सँभालना, उचित जगह बाजारों में पहुँचाना तथा हलधर को उसकी मेहनत का सही मूल्य मिले इसकी व्यवस्था का जिम्मा आता था। देश के विकास के पहिएं इनकी बेहतरी पर निर्भर थे। दोनों एक-दूसरे के पूरक अंग थे। कृषिप्रधान इस भारत की किस्मत 'जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान' पर ही आधारित थी। 

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में..


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