शीर्षक : पिता!
पिता!
परिवार का मजबूत सम्बल,
परिजनों का अक्षय आत्मबल,
शिशिर में गर्म-मुलायम कंबल,
शनै: शनै: दे हौसलों को बल!
पिता!
उड़ने को दे विस्तृत आकाश,
ज्ञान का दे तेजोमय प्रकाश!
तरोंताज़ा रक्खे जीवन-आस,
अनवरत करे भागीरथ प्रयास!
पिता!
खुद भले हो लकीर का फ़क़ीर,
बच्चों की संवारें तक़दीर!
खुद भले न जिए ज़िन्दगी,
स्वेद से सींचे अपनों की ज़िन्दगी!
पिता!
खुद पहने फटे जूते, फटी क़मीज,
बच्चों को दे हर चीज अजीज़ !
स्व-स्वप्न पर मिट्टी डाल बोये बीज,
बच्चों को परोसे खाना लजीज!
पिता!
ममतामयी माँ का मजबूत सहारा,
कश्ती का उम्मीदोंभरा किनारा!
सुख-समृद्धि अक्षय पात्र सुनहरा,
ठण्डी छाँव देता दरख़्त हरा-भरा!
पिता!
अनुशासन का दूसरा नाम पिता!
माँ के सुहाग की शोभा पिता!
बच्चों का नीला आसमान पिता!
स्वजनों के उम्मीदों का दीया पिता!पत्थर तराश शिल्प गढ़ता पिता!
बहना के हाथों की खनक पिता!
सुरक्षा का अभेद्य किला पिता,
घर-आँगन की सौन्धी खुशबु पिता!गुलाब की काँटों भरी पौध पिता!
मंझधार में नाव की पतवार पिता!
दिल में लंगर डाल खड़ा जहाज पिता!
सृष्टी-सृजन का कर्ता-धर्ता-दृष्टा पिता!
श्रीफल सा कठोर, नारियल-पानी सा मीठा पिता!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!