उम्मीद!

शिक्षा-दीक्षा, सेवा-चिकित्सा,
जुड़ जाएं सिक्कों की लिप्सा।
सेवा बने स्वार्थ-पूर्ति साधन।
दर-दर ठोकरें खाता निर्धन।।

बैसाखी आरक्षण की थाम कर,
जाति आरक्षित कोटे के दम पर,
मतिमंद जब बन जाएं डॉक्टर!
मेरिट वाले कतार में सड़क पर।।

व्यवस्था में छिद्र, रीसता हो जल,
हाँपने लगता युवाओं का मनोबल।
पैसा समाज में हो सब कुछ अगर,
उम्मीद क्यों पेशेवर न हो डॉक्टर?

स्वार्थ के तवे पर रोटी फुलाने वाले,
तैयार बैठे जहाँ में जमीर बेंचने वाले।
आदर्शो का मेरुदंड झुक गया जहाँ,
आशा क्यों युवा से गिरेगा नहीं वहाँ।

प्रतिभा की हो कद्र निज देश में,
सुचारु व्यवस्था, संसाधन हाथ में।
कौन भला जायेगा परदेश में?
परिवार, स्नेही छोड़ मायर देश में?


स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

इस पर लोग क्या कह रहे हैं