माँ गंगा-भागीरथी का लहराता आंचल,बहती ज्ञान-सरिता, निर्मल, कलकल,
सागर से मिलने अधीर, पल-पल,
झर-झर झरे जर्रे-जर्रे में रुधिर चंचल!
मातृभूमि की धड़कन अविचल,
अहर्निश नाद-ब्रह्म, ॐकार सकल!
हिन्दी....
जन-जन के स्पंदन की वाणी,
ज्ञान-भंडार, माँ सरस्वती, पाणिनी!
प्रेमचन्द की तू जन कल्याणी,
कबीर, सूरदास की तू धाणी,
हिन्दी! तू साहित्य शिरोमणि,
उतुंग हिमालय की मुकुट मणि!
हिन्दी....
राजा, रंक भरे तेरे आगे पानी!
समानता, संस्कृति, सभ्यता की तू जननी!
पौरुष की पहचान, तलवार भवानी!
धर्म, संस्कार, मानवता की खाणी!
माँ भारती... आन-बान-शान पुरानी!
प्रकृति-रुपा, क्षमाशील अधम-मति-संहारणी!