नारी! नमन माँ शारदे 🙏🙏
महा शशिवदना छंद।

शीर्षक : सिंदूरी खेला!

सिंदूरी खेला, खेला बहनों ने।
मान बढ़ाया है, तमगे-गहनों ने।।

नफ़रत-बीजों को, दुश्मन बोया है।
अबला समझा है, उसने धोया है।।

दूम सदा टेड़ी, कुत्ते की बढ़ती।
बरसों भीतर हो, टेड़ी ही रहती।।

खाक हुई रस्सी, बल जाना बाकी।
पाप कमाई का, नशा फना साकी।।

भारत माता की, संतति प्यारी है ।
नारी या नर हो, खल पर भारी है।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।


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