शीर्षक : म्हारो राजस्थान!
म्हारा मायर भूमि री माटी री,
खुशबू सौंधी-सौंधी प्यारी!
मरुधरा रा आन-बान-शान री,
रंगत सब सु न्यारी-न्यारी!
तपती रेत बोले त्याग री बोली,
धरती भरे आशिषों थी झोली!
शूर-वीर जनम्या इण माटी में!
वीरांगना कुदी बळती ज्वाला में।
महल-मेरियां अठे सजिया जी!
मोर टहूंकियां ऊंची छत पे जी!
भाट गावे गीतडा, तोड़ बेड़ियां जी ,
मायर सुलावे कुंवर, गावे लोरियां जी!
रंग-रंगीलो म्हारो राजपुताना!
फागण में बरसे रंग, सज गयो जी जोधाणा!
राजपूती तेज तेवर, सूरज सु तेजस्वी बाणा!
घणी-घणी खम्मा जी म्हारा प्रतापी महाराणा!
पुरखों री धरती, करु कीण विध बखाण जी?
मृग-मरीचिका सी भूमि, मांगे नित बलिदान जी!
आग उगलती रेत में सांस दुश्मन री अटकी,
महाराणा आगे अकबर की फीकी पड़ गई नौटंकी!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र
*सौजन्य : चित्र अज्ञात कलाकार...