पुरखों की धरती पर छुट्टियां मनाना हमारे लिए एक स्वर्णिम मौका था! हमारे गाँव से नौ किलोमीटर दूरी पर विश्वविख्यात राणकपुर जैन मंदिर है जहां मेला लगा था! मैं और मेरी भुआ ताजी मूली खाते खाते चल कर मेले में पहुंच गई! रेत में उगाई मूली का स्वाद ही कुछ निराला था! अभयारण्य, बलखाता भुजंग सा रास्ता, बुजुर्ग पीपल, वटवृक्ष, अरावली की पर्वतमाला से बहती नदी और बीच बीच में नाचता, टूँहुकारता मोर...प्रकृति का सुंदर रूप देख कर कोई भी उसपर मोहित हो जाए! तीन मंजिला, अप्रतिम कारीगरी और भौमितिक अजूबे के लिए विश्वप्रसिद्ध इस मंदिर की शोभा अवर्णनीय थी!
खूब खेले कूदे, गुब्बारे खरीदे, मटके में रखी इमली की चटनी के साथ मूंग दाल की कचोरी का मजा लिया और घर की ओर निकल पड़े! चलते चलते बुड्ढी के बाल खाने की खुशी अलग ही थी! थोड़ा चलकर हम 'टमटम' में सवार होकर घर से करीब पहुंच गए! वो लटकते लटकते सवारी करने का सुख गांव में नसीब होता है! सूरज की विदाई की बेला, ठंडी हवाएँ और खड़खड़ाती, दौड़ती 'टमटम, जिसमे उसकी क्षमता से कई ज्यादा लोग सवार हो जाते थे! आखिर जगह दिल में हो तो कौन नहीं समा सकता?
कड़ाके की ठंड में रजाई में सिमट कर सोने का आनंद स्वर्ग की हूर की गोद में सोने से भी अव्वल था!
दादी की प्यार भरी आवाज़ से ही नींद खुलती थी हमारीं! नीम का दातुन, 'उकली' पे खुले में शौच के लिए जाना, घर के सामने के कुएं से डोलची से पानीं निकल कर नहाना, बालों में 'चिट' न हो इसिलए 'मेट (मुल्तानी मिट्टी) से नहाना सब कुछ नया नया था मेरे लिए लेकिन भुआ के लिए यह सब रोजमर्रा की बातें थी! कुएं से पानी निकालते निकालते अक्सर 'डोलची' कुएं में गिर जाती थी! भुआ फिर 'मिनकी' (रस्सी से बंधा हुक का गुच्छा) लेकर आती थी और हम फिर लग जाते थे काम में!
ताजी सब्जियाँ लेकर जब भी 'मालन' आती थी दादी मोलभाव करने में लग जाती थी और हम हरे मटर खाने में! में कहती, 'पोतरी (पोती) हे के...भईसा कटे?' दादी का चेहरा खुशी से सराबोर हो जाता! वो देहरी पर बैठ कर बातें करती और हम ताजा दूध और हलवा खा कर खेलने में लग जाते!
गांव में बड़े बड़े लकड़ी के दरवाजे थे! अंदर महलनुमा मकान, घर! रात के समय बड़े दरवाजे बंद कर दिए जाते और छोटा सा दरवाजा खुला रख्खा जाता! शायद आक्रांताओं तथा आक्रमणकारियों से बचने के लिए यह व्यवस्था थी!
माँ, दादी मिलकर चूल्हे पे खाना बना लेती थी! मिट्टी के बर्तन में बनी कढ़ी, सब्जी का स्वाद कुछ अलग ही था.... गांव की मिट्टी की खुशबू और दादी का प्यार जो घुला था उसमें! उपलों में बने दाल बाटी और चूल्हे पे बने गट्टे के साग के सामने बादशाही खाना भी फीका था! सच कहूं तो आज भी दादी के हाथ के बने मकई के ढोकले और खाटे (बडी डाल कर बनाई गई कढ़ी) का स्वाद भूल नहीं पाई हूँ मैं!
खाना खा कर सुस्ताने लगते कि एक भिखारण आ जाती मुख्य द्वार के जाली के पास और गाने लगती...." रेलगाड़ी आई,....मोतियों र गाजर लाई... देखो भुआबाई थारी.... रेलगाड़ी आई! " घर की रौनक और चहलपहल से ही वह समझ जाती कि दिसावर से मेहमान आये है! दादी भी बचाखुचा खाना उसके पात्र में उंडेल देती और कहती, ' घीसू रा टाबर आया हे...रुकी क्यों? रेलगाड़ी गावे नी... और दो चार नाम तो ले...'
सुबह का निपटने में मैं और भुआ हाथ बंटाते! माँ को चूल्हे की राख लोहे की टोकरी में लेकर बर्तन मांजते हुए देख कर मैं भी लग गई बर्तन मांजने में! पीतल के और मिट्टी के बर्तन राख से मांजने का अनुभव नया था! कभी कभी राख की जगह रेत लेकर भी बर्तन मांझी लेते थे! घिस घिस कर पियल के बर्तन को सोने से चमकदार बनाना शौक बन गया था हमारा! पानी की कमी की वजह से यह तरीका अपनाया जाता था!
जीरालुण डालकर छास पीना पसंद था लेकिन जाड़े के दिन थे लेकिन किशन जी की कुल्फी की घंटी बजी नहीं कि बच्चे, किशोर, किशोरियाँ बाहर आकर किशन जी को घेर लेती थी! उनकी बनी मलाई कुल्फी की बराबरी शहर का कोई ब्रांड नहीं कर पाया था! पेपर पर कुल्फी लेने के बाद भी जब तक उल्टी हथेली पर किशन जी 'चुंगी' नहीं देते, बच्चे, बूढ़े को एहसास ही नहीं होता कि कुल्फी खाई है!
अब बारी थी जलाऊ लकड़ी के भारे लिए दरवाजे पे आई भीलणी की! माँ मोलभाव कर सौदा तय करती और भीलणी लग जाती लकड़ी के छोटे छोटे टुकड़े कर ओटले के नीचे बने खाने में लकड़ी ठूसने में! उसका वो घागरा और कासरी (चोली) अक्सर मुझे नौरता (नवरात्र) की याद दिलाती है!
सूर्यास्त से पहले भोजन हो जाता था और फिर बारी आती थी माँ के हाथ की बनी अदरक, चाय का मसाला, हल्दी डालकर बनी 'उकारी' की! कुल्हड़ में 'उकारी' पीना मानों अमृतपान करना!
दिनभर की थकान और मस्ती की वजह से कब सपनों की दुनिया की सैर कर परिंदे से घर लौट आते, पता ही नहीं चलता था!
नानी जी का घर उसी गांव में, पास के 'वास' में ही था! घर में शादी की शुरुआत 'ताराचंद जी की बावड़ी' पर जा कर , पूर्वजों को श्रीफल चढ़ा कर, जात देकर ही होती थी! यह दानवीर भामाशाह के भाई ताराचंद जी का स्मारक है! युद्ध में दुश्मन से लड़ते लड़ते जब ताराचंदजी वीरगति को प्राप्त होते है तो उनके घोड़े उनका कटा सिर लेकर लौटते है तो उसे देख उनकी पांचों रानियां इस बावड़ी में जोहर करती है! पूर्वजों को जात देने जब मैं, माँ और नानी के साथ वहां पहली बार पहुंची तो कई स्तर नीचे उतरती सीढ़ियों और बावड़ी को।मैं देखती रह गई!
महाराणा प्रताप की जन्मस्थली कुंभलगढ़ यहाँ से सिर्फ 35 किलोमीटर पर है और भामाशाह हमारे पूर्वज है यह जान कर आज भी आंखों के सामने इतिहास के पन्ने मुखर हो बोलने लगते है,खून में वीररस कुलांचे मारने लगता है!
यादों के फूल मन के आंगन में बारिश की फ़ुहारों के बीच मुस्कुरा रहे थे! बचपन की वो छोटी छोटी खुशियां, वो भोलापन, वो मासूमियत समेटने में लगी थी मैं, भीनी भीनी, सौंधी सौंधी खुशबू में खो चुकी थी मैं!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, मुम्बई।