यादों के बवंडर से निकल गए होते...गर खुशबु तेरी फ़िजा में घुली होती!
मौजों के थपेडों को निगल गए होते...
आबरू वफ़ा की साँसों में घुली होती!
क्यों डोलती रही वक़्त के झूलों पर?
आफ़ताब रोशनी में नहा गया होता!
जहाँ को अलविदा कह निकल गए होते,
सर्द रातों में माहताब नूर बरसा गया होता!
देख दरया भी तेरी मासूम अंगड़ाइयाँ सनम,
ज्वार से मोम सा पिघल गया होता!
रोशनी का कतरा देख ओस बिखर गए होते,
झील सी आँखों में कंवल खिल गएँ होते!
छलकते पैमाने से छलकी घुली पीड़ गालों पर,
अक्स झिलमिला कर कहकहें बिखेर गया होता!
मय के हर प्याले में घुल गया था एहसास तेरा,
झुकी निगाहें झपकती पल-पल, इश्क़ जिन्दा होता!
ग्रह-नक्षत्र की फेहरिश्त में नाम अपना भी जुडा होता,
अमावस की रात में टिमटिमा कर नजरें झुका लेती,
कहीं एक तारा टूट कर पत्थर बन गया होता,
दास्ताँ-ए-दिल की दुनिया को सुना गया होता!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |