मायर भूमि...

एक रात ऐसी भी जब मैं सात समंदर पार की सैर कर मातृभूमि पर कदम रखने वाली थी! जैसे ही मैंने अपनी जन्मभूमि पर कदम रक्खा, मन उमंगों से भर गया! पहली बार एहसास हुआ कि मातृभूमि की बराबरी कोई नहीं कर सकता! यहीं वह धरती है जिसकी गोद में पल-बढ़ कर, जिसके आँचल में खेल-कूद कर, जिसकी छत्र-छाया में शिक्षा-दीक्षा लेकर मैंने अपने पंखों को फैलाया था, बलशाली, मजबूत और सक्षम बनाया था! यहीं वो धरती है जिसने अपने वक्षों से लगाकर मुझे अपना दूध, यानि कि अमृत रस पिला कर पाला-पोसा था!
आज जब मैं सक्षम, सबल हो गई, कुछ अपनी माँ भारती को लौटाने के काबिल हो गई, तो कैसे भूल जाऊ इस धरा को? मेरी मायर भूमि को? कैसे न निभाती मैं अपनी जननी जन्मभूमि से रिश्ता? क्या स्वार्थवश, पैसे की चकाचौंध में भूल जाती मैं उसे? क्या काम की यह उत्कृष्ट मेघा की उपलब्धि?
आधुनिकता तथा भौतिकता में उलझे पाश्चात्य संस्कृति के बाशिंदों के बीच कुछ दिन रह कर भारतीय संस्कृति का महत्व समझ में आ गया था! रिश्तों की नमी का एहसास मातृभूमि की मिट्टी के स्पर्श से महसूस हो गया था!
रात अपने पूरे शबाब पर थी! मन के आकाश में तारें जगमगा रहे थे और चांद मुझे देख मुस्कुरा रहा था! मानों कह रहा था... "दूर के ढोल सुहावने" ऐसी खूबसूरत रात के बाद की सुबह कितनी सुहानी होगी... अकल्पनीय, अदभुत, अविस्मरणीय!

 

इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
  • बहुत खूब