हँसगति छंद हँसगति छंद :
मात्रा भार 4 4 2 1 3 2 4 
शीर्षक : कर्म योग! 
धर्म-कर्म का योग, कठिन है यारों। 
जिद्दी बन दो भोग, अटल पथ प्यारों। 
मानव भव संजोग, भाग्य अति भारी। 
सन्त चरण को पूज, सिद्धि पा न्यारी। 

 प्रभु दर्शन की आस , पूर्ण कर देवा। 
दीन-दुखी की रोज, करो मनु सेवा। 
कण-कण में है देव, जान ले बन्दे। 
पापी का है अन्त, दुष्ट तज धन्दे।। 

 गुरु पद पंकज ध्यास, नमन है ज्ञानी। 
घट में भर लूं आज, गंग का पानी। 
कर्म योग का मेल, सकल जग त्राता। 
देना मनु संतोष, शान्ति के दाता।। 

स्वरचित तथा मौलिक, 
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं