तेरे अलविदा कहने के बाद,
न दुनियादारी रुकेगी न जश्न-ए-बहार,
न रिश्तों के भंवर में गोते लगाता प्यार!
न आँखों में होगा अश्क़ का सैलाब,
न अनसुलझी पहेलियों का जबाब!
पागल मनवा! क्यों भटक रहा है?
जीवन मृग-मरिचिका में,
मधुपान में व्यस्त भौरे सा!
नश्वर शरीर के मोह में,
शाश्वत सत्य से दूर मानव सा!
पागल मनवा! क्यों समय गवाँ रहा?
कठपुतली तू, रंगमंच दुनियादारी!
ईश्वर के हाथ है तेरी डोरी!
सत्कर्म कर, जीवन गुल्लक भर!
धर्म के पथ पर रह सदा अग्रेसर!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!