लहू के दो रंग

लहू के दो रंग
✍️ Vijay Sharma Erry

(1)
वक़्त बदल गया, इंसान भी बदल गए,
चेहरों पे मुस्कान, पर दिलों में जल गए।
जहाँ फ़ायदा दिखा, वहाँ प्यार के संग,
जहाँ मतलब नहीं, वहाँ लहू का रंग भंग।

(2)
लाल लहू वहाँ, जहाँ स्वार्थ की बात हो,
झूठी हमदर्दी, और चालों की सौगात हो।
जहाँ मतलब निकले, वहाँ रिश्ते पक्के,
वरना अपने भी बन जाते हैं अनजाने धक्के।

(3)
Erry ने देखा ज़माने का ये खेल,
सफ़ेद लहू वहाँ, जहाँ दिल हुआ फेल।
जिन्हें माना था साया, वही छाँव छोड़ चले,
मतलब की दुनिया में, सब रिश्ते तोल चले।

(4)
आज लहू भी रंग बदलता है पल में,
रंग लाल तब तक, जब तक हो तू छल में।
सफ़ेद बन जाता है जब तू हो काम का नहीं,
ये ही है सच्चाई, अब रिश्तों में जान बाकी नहीं।

(5)
दोगलेपन की ये दास्तान हर मोड़ पे मिलती है,
जहाँ स्वार्थ नहीं, वहाँ ज़ुबां भी सिलती है।
दिल के रिश्ते भी अब व्यापार बन गए हैं,
इंसान के चेहरे पर दो नक़ाब तन गए हैं।

(6)
Erry कहे — "सुनो ज़मीर की आवाज़ अब भी कहीं है,"
सच्चा लहू वही जो इंसानियत में बहती रही है।
एक रंग बना लो जो सच्चाई को छू ले,
वरना ये दो रंग की दुनिया हर रोज़ तुम्हें कूले।


अगर आप चाहें तो मैं इस कविता का पोस्टर या रील के लिए लाइन ब्रेक वर्जन भी बना सकता हूँ।


द्वारा Vijay Sharma
Shared28 Jul 2025
Start 28 Jul 2025
End 28 Jul 2030
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