भाग ४५
वार्षिकोत्सव का खुमार उतर चूका था। सूर्य उत्तरायण की ऒर बढ़ कर मकर राशि में प्रवेश कर चूका था! बृहस्पति वृषभ राशि में झाँक रहा था और पावन महाकुम्भ का मेला बारह वर्षों बाद सनातनियों के आस्था-कलश को अमृत बूंदों से पवित्र कर रहा था! समस्त विश्व की नजरें इस विराट कुंभ मेले पर लगी थी और मित्र-मण्डली की नज़रे आगामी परीक्षाओं पर!
मित्र-मण्डली आज कॉलेज की लायब्ररी में इकठ्ठा होने वाली थी। सफलता के झंडे गाड़ सभी अब पढ़ाई की वैतरणी को सफलतापूर्वक पार करना चाहते थे! सभी भले ही मेधावी छात्र थे लेकिन वो जानते थे शीर्ष पर बने रहने के लिए निरन्तर प्रयास, अभ्यास जरुरी हैं ! उन्होंने पढ़ाई नियमित रूप से हो इसलिए टिफिन साथ में लाने तथा दो घण्टे कॉलेज में ही अभ्यास कर बाद में घर लौटने का निश्चय कर लिया था!
वज्र और वैदेही एक ही कक्षा में थे। उन्हें मिल-जुल कर पढ़ाई करने की आदत सी हो गई थी। वो एक-दूसरे से अपनी शंकाएँ साँझा करते, सवालों के सही जबाब ढूंढ़ते तो कई बार पुराने प्रश्नपत्रों के उत्तर ढूंढ़ कर, विषय को गहराई से समझ कर अभ्यास करते! हर विषय की किताब में हर सेमिस्टर के हिसाब से दिए गएँ 'नमूना प्रश्नपत्र' को भी हल करते और एक-दूजे को बीच-बीच में सवाल पूछ झूठ-मूठ एक-दूजे की तैयारी का जायजा भी लेते!
विभा का विभाग पूरी तरह अलग था बाकी तीनों वाणिज्य शाखा के विद्यार्थी होने के नाते उनका अभ्यासक्रम एक-दूजे के पूरक था। सभी पढ़ाई में व्यस्त थे पर यश का पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था! जब भी किताब खोल कर पढ़ने लगता मन में बैडमिंटन से जुड़े अनगिनत विचार धमाचौकड़ी मचाते और उसका ध्यान विचलित करते!
वह बोल पड़ा, " बहुत हो गया यार! पढ़-लिख कर किसका भला हुआ है ? चलो! घर चलते हैं ब्यूटी क्वीन! तू जरूर बड़ी लेखिका बनेगी मगर तुम्हारा गुल्लक तो सदा 'ठन ठन गोपाल' ही रहेगा न यार!
साहित्यकारों को प्रमाणपत्र, सम्मानपत्र जरूर मिलेंगे लेकिन रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के प्रतिज्ञापत्र नहीं! उसके लिए हम वाणिज्य के दोस्तों के पास आना ही पड़ेगा यार तुम्हें "
सब हँसने लगे! एक तरफ साहित्य की मौजूदा हालात पर करारा व्यंग था तो दूसरी तरफ खुद पर ही हँसने-हँसाने का मौका!
विभा बोल पड़ी, " ये मोटू! कितना पेट बढ़ाएगा यार! नोटों के पहाड़ पर बैठ कर ही नीला आसमान देखेगा क्या? कभी परिंदा बन कर भी तो आसमान को नाप!"
यश हँसने लगा, "क्या भिड़ु! क्या डायलॉग मारा यार! जरूर एक दिन तुम्हें 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' मिलेगा यार! सुन! वो जो कैश यानि कि धनराशि मिलेगी न... वह हमें दे देना! तू सर्टिफिकेट देख-देख कर जी लेना "
फिर सब हँसने लगे! अंतर्मन में हकीकत के असंख्य कांटे चुभ रहे थे लेकिन करें भी तो क्या?
विभा बोल पड़ी, " यार! यह यश है न.... जब लख़नऊ जायेगा न...तब... तब कहीं जाकर पढ़ाई होगी हमारी! "
फिर सब हँसने लगे।
हँसते-हँसते विभा की आँखों से असमय बारीश शुरू हो चुकी थी! कई दिनों से वह अपने अंदर आँसूओं का सैलाब छुपाये बैठी थी लेकिन आखिर कब तक? कब तक रोक पाती वह अपने अंदर छुपी पीड़?
तभी वज्र बोल पडा, "विभा! यह क्या? एक तरफ सुनहरी धूप और दूसरी तरफ बारीश की फूँहारें! हम तो कब से उम्मीदों के इंद्रधनुष का इंतजार कर रहे हैं! तुम ही तो चाहती हों कि यश के गले में जीत की वरमाला हो.... फिर यें तेरे आँसू? कमजोर क्यों कर रही हो उसे?"
वैदेही कुर्सी से उठ कर विभा के पास आई! उसकी पीठ थपथपा कर उसे पानी की बोतल थमाई और सब निकल पड़े लाइब्रेरी में किताबें जमा कराने!
यें कैसा अजीब रिश्ता है? जब तक साथ-साथ है, तब तक आँखें ज्यादा बोलती हैं, लफ्ज कम! सारा वक़्त गुजर जाता है शिकवे-शिकायतों में, रोने-मनाने में!! बिछोह की जरासी भनक लगते ही मन विचरण करने लगता है तन्हा-तन्हा...बदहवास, अकेले-अकेले..कल्पना लोक में..ऐसा लगता है मानों माँ की गोद में खेल रहे बच्चे ने अपने नन्हे हाथों से माँ के गले की मोतियों की माला खींच दी हो और माला टूट कर सारे मोती इधर-उधर बिखर गएँ हो!
वैदेही ने आसमान में छाएं घने बादलों को देख कर वातावरण को हल्का बनाने के लिए शगुफा छोड़ दिया!
"यश! तुमने रुलाया न ब्यूटी क्वीन को! अब तुम सबको मिल्क शेक पिलाओगे!"
तभी यश बोल पड़ा, " अपनी 'ब्यूटी क्वीन' के लिए मिल्क शेक तो क्या काजू कतली भी खिला दूंगा यार! चलो! चलते है 'अदिति' में...
यश के मुँह से हॉटेल 'अदिति' का नाम सुनते ही विभा के आँखों के आँसू मोतियों से चमकने लगे!
"चलो जल्दी.. जल्दी! कहीं वहाँ पहुँचने से पहले ही इस 'महाकंजूस शिरोमणि' का विचार न बदल जाएं "
और यश के साथ सभी खिलखिला कर हँसने लगे!
वज्र और वैदेही ने घर पर फोन कर बता दिया था और विभा के माता-पिता आज विधान भवन में मंत्री जी से मिलने चले गएँ थे तो विभा ने लाली को खाना खा कर आराम करने को कह दिया था!
बहुत दिनों बाद सभी एक साथ दक्षिण भारतीय व्यंजनों का मजा लें रहे थे जिसके लिए यह हॉटेल प्रसिद्ध था ! साथ में यश ने गुलाब जामुन मंगवा दिए थे! वैदेही की तो आज लॉटरी लग गई थी! मिठाई में गुलाब जामुन उसे बेहद प्रिय था! आज वज्र ने भी बिना झिझक सभी व्यंजनों का आनन्द लिया! अब उसकी दवाईयाँ भी कम हो चुकी थी और उसके शांत, धीर-गंभीर स्वाभाव की बदौलत उसका रक्तचाप भी तय मानकों पर खरा उतर रहा था! वज्र ने सिर्फ एक गुलाब जामुन चखा! वैसे वज्र का रसना पर पूरा नियंत्रण था!
विभा को हँसते देख यश बहुत उत्साहित था! उसने मौका देख कर एक गुलाब जामुन विभा के मुँह में ठूंस दिया! बेचारी विभा बोले भी तो कैसे? मुँह का पूरा ट्रैफ़िक ही जाम कर दिया था यश ने!
आज बैडमिंटन की प्रैक्टिस के लिए भी जाना था विभा और यश को! दोनों ने पांच बजे साथ-साथ जाने का निश्चित किया और सभी अपने-अपने आशियाने की ऒर चल पड़े।
वैदेही घर पहुंची तो उसने देखा आई उसका इंतज़ार कर रही थी। वज्र से विदा ले कर वह अंदर पहुंची! माँ को इतना खुश देख कर वह अचंभित थी। माँ के हाथ में एक लिफाफ़ा था!
वैदेही ने पर्स को सोफा पर रक्खा और माँ ने दिया लिफाफ़ा खोल कर देखने लगी! यह पत्र भारत सरकार की तरफ से आया था! वैदेही ने लिख कर भेजा हुआ स्लोगन चुन लिया गया था और उसे प्रथम पुरस्कार मिला था! ग्यारह हज़ार की धनराशि उसे पुरस्कार स्वरुप मिली थी। लिफाफे में भारत सरकार द्वारा भेजा गया ड्राफ्ट था! वैदेही तो भूल ही चुकी थी कि उसने प्रतियोगिता के लिए यह स्लोगन ईमेल से भेजा था और स्वलिखित पत्र के साथ उसे टंकित कर कर भी भेजा था! युवाओं की आत्महत्या से जुड़ा यह जटील विषय था! वैदेही ने लिखा था,' हारना मंजूर है, जीवन से हारना मंजूर नहीं '
वैदेही ने ड्राफ्ट माँ के हाथ में रक्खा और जानकी जी को प्रणाम कर वह अपने पिता जी की फोटो के सामने खड़ी हो गई! पिता को वंदन कर वह भगवान के सामने आँखें मुंद कर बैठ गई! जानकी जी कब पास आ कर बैठी उसे पता ही नहीं चला! दोनों मन ही मन श्री को याद कर रही थी! अपने सब से प्रिय व्यक्ति के साथ वे अपनी खुशियाँ बाँटना चाहती थी!
वैदेही की आँखों के सामने उसका बचपन बाहें फैलाएं दृष्टीगोचर होने लगा! संक्रांति का त्यौहार था! माँ ने तिल और गुड़ के लड्डू बनायें थे! श्री के आते ही जानकी जी ने चाय के साथ नमकीन बिस्किट्स दिए और साथ में तिल के लड्डू! वैदेही को मीठा बहुत पसंद था! वह पिता के साथ छुपा-छुपी खेलते-खेलते हर बार एक-एक लड्डू मुँह में डाल रही थी! श्री चाय के साथ बिस्किट्स से ही काम चला रहा था! जानकी जी ने जब देखा कि वैदेही सब लड्डू अकेली ही खा चुकी है तो वह वैदेही को डांटने लगी। वैदेही श्री के पीछे छुपी थी! श्री ने उसे प्यार से सामने खींचा और एक मीठी सी चुम्मी देकर कहा, मेरी वैदेही को मीठा बहुत भाता है न! अब देखना, जब भी मैं बाहर गांव से लौटूंगा, तुम्हारे लिए हमेशा मिठाई लाऊंगा बेटा! जानकी! देखना हमारी वैदेही कितना मीठा-मीठा बोलेगी! सबका मन मोह लेगी!
यादों की तितलियाँ इस फूल से उस फूल पर मंडरा रही थी और अतीत में घूम-घूम कर मधु-कण इकठ्ठा कर रही थी।
रंग-बिरंगी तितलियों के परों सी यादें वैदेही को झकझोर रही थी! पिता के लाड़-दुलार को वह सालों से तरस रही थी! माथे पर आशीर्वाद स्वरुप रखा हाथ अब उसकी किस्मत में नहीं था लेकिन उस दिव्यात्मा के आशिष स्वर्ग से छन-छन कर आ कर उस पर बरस रहे थे....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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