विश्व-शान्ति पैगाम हैं तो कैसे होगी जग-हंसाई?
श्वेत कबूतर उड़ाने से क्या होगी हिंसा की भरपाई?
बैठे-बैठे बारूदी ढेर पर, क्या मिट जाएगी तन्हाई?
कैसे गा पायेगा कोई मिसाइलों के शोर में रुबाई?
मानवता के नील गगन पर छाया अहंकार का कोहरा।
छोटे-बड़े देश बने महाशक्तियों की शतरंज का मोहरा।
कहीं ब्रह्मास्त्रों का मेला, कही अंतरिक्ष में ठौर की दौड़।।
कहीं टकराती महत्त्वकांक्षाएं, कहीं सर्वोत्तम की होड़।
प्रकृति माँ का जारी क्रन्दन, मनुज-लालसा पर नहीं बन्धन।
स्वार्थ की तंग गलियों में फँसा हैं चेतना का स्वर-स्पंदन।।
विश्व-शान्ति के वटवृक्ष पर झुण्ड में हैं उल्लू
निठल्ले।
खून के आँसू रुला-रुला कर अपनी बोलें बल्ले-बल्ले।
शरणर्थियों का कारवाँ देख दिल होता है तार- तार।
आतंकियों के जनाजे में शामिल सेना करती जय-जयकार।।
मुँह में अल्लाह, बगल में आतंकी, कैसे दोगे विश्व-शान्ति पैगाम?
कर्ज, हथियार दे महाशक्तियाँ कैसे कसेगी युद्ध की लगाम?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।