क्या चेतना मृत हो चुकी है सभ्य समाज की?
क्या मन-मस्तिष्क बन गया पाषाण मनुज का?
क्या चैतन्यविहीन हो जाता ह्रदय, देख अत्याचार को?
क्या रुधिर नहीं उबलता देख नारी-उत्पीड़न- संहार का?
मौन चूड़ियाँ, चीर-चीर चुनर, न चहचहाट चिड़ियों की!
चंचल बयार है रुकी-रुकी, काली घटाएँ झुकी-झुकी!
रक्त से सिंचीत है धरा, हरियाली दुब पर आँसू प्रकृति के!
बिलख रही पीड़िता, असहाय-जख़्मी, बिचो-बिच भीड़ के!
चेतना-शून्य समाज से उम्मीद कैसे करें मदद की?
द्रोपदी चीर-हरण में मौन राज-दरबार युगों बाद भी!
कहाँ है श्रीकृष्ण, कहाँ रणबांकुरे-खल- विनाशक अभी?
कौन सुनेगा दर्द भरी चीख? खड़े हो जब
दर्शक सभी!
अन्तर-आत्मा जागृत नहीं जिस सभ्य-दीन समाज की,
आग में स्वाहा: होगी ललनाएँ श्रीहरि को पुकारती!
न्याय की देवी जब हो बन्धक बाहुबली, धन्नासेठ की,
किससे उम्मीद करेंगी भुक्तभोगी न्याय के
सौगात की?
अवचेतन मन को झकझोर दो, कुण्डलिनी जागृत करो,
सर्वजनसुखाय, सर्वजनहिताय, चैतन्य शक्ति सृजीत करो!
आत्मचेतना की दीपशिखा प्रज्वलित हो, तम जग से हरो,
ब्रह्मस्वरुप जीवात्मा को ब्रह्मनाद से झंकृत करो, अलंकृत करों!
लेखिका : कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र, भारत |