प्यार..इन्सान से करो या पशु से..

 

शीर्षक : प्यार..इन्सान से करो या पशु से, क्या फर्क है?

प्यार इन्सान से करो या पशु से, क्या फर्क है? प्यार तो प्यार है! प्यार जी भरकर बिनधास्त करने का हक़ तो सभी को हैं! प्यार जीवन वह उजाला कोना हैं जो अपनी चमक से पुरे जीवन को उजालों से भर देता हैं फिर वह चाहे किसी खूंखार जानवर से जारो या पालतू पक्षी से! निस्वार्थ भाव से एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करना, एक-दूसरे की फ़िक्र करना, हर सुख-दुख में अपने हमसफ़र का साथ निभाना, त्याग, बलिदान, समर्पण के लिए सदैव तैयार रहना, प्यार ही तो है लेकिन मिलता कहाँ ऐसा प्यार? हाट में या बाज़ार में, मुहोब्बत की दुकान पर या बड़े बड़े मॉल में?

प्यार एक एहसास है जिसके सहारे इंसान बड़ी से बड़ी अवरोधों की चट्टान को चूर-चूर कर आगे बढ़ सकता है....प्यार सृजन की वह अंगड़ाई है जिसकी चाहत हर किसी जीव को होती है! प्यार सिर्फ पाने का नाम नहीं कुछ अपने पर नौछावर करने का नाम है, सब कुछ लुटा कर मुस्कुराते हुए जीने का नाम है!

इन्सान और जानवर, प्यार के सब दीवाने हैं! प्यार बिना जीना रुह बिना शरीर! आखिर फिर क्या फर्क है दोनों के प्यार में?
बहुत फर्क है जी बहुत फर्क है! जमीं-आसमां का फर्क! मौसम का मिजाज़ क्या बदला, इंसान की नियत बदल जाती है!  बुरे वक़्त में इन्सान साथ छोड़ कर चल देते है, गिरगिट से रंग बदलते हैं पर पशु.. उनके प्रेम में होती हैं सच्चाई! जीवन के धूप-छाँव में वो साथ छोड़कर, अनगिनत बहाने बनाकर कन्नी कांट कर चाल नहीं देते मुँह फेर कर..

बड़ा अन्तर हैं इंसान और जानवर के प्रेम में! ...पशु विपरीत परिस्थितियों में भी साथ निभाते हैं, औरों के उपकारों को विपदा में भी याद रखते हैं! एक कुत्ता मालिक की खाई रोटी को कभी नहीं भूलता भले ही उसका मालिक स्वार्थ वश उसपर अत्याचार क्यों ण करें लेकिन इंसान... उसकी फ़ितरत है...मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं.. यूँ जा रहे हैं जैसे हमें जानते नहीं..

 

 

 

इस पर लोग क्या कह रहे हैं