भटक रही थी उपवन-उपवन,
नन्ही चिड़िया भोली।
कहीं सजे थे फूल-पत्ते,
कहीं हरी-भरी थी डाली।।
दुविधा में थी नन्ही पक्षिणी,
कहाँ सजाऊं बसेरा।
विशाल वृक्ष की डाली झेले,
आँधी-तूफान घणेरा।।
तिनका-तिनका जोड़ चिड़िया,
बांधे अपना घोंसला।
नन्हें-मुन्ने को सुला नीड में,
चली नाँपने नभ नीला।।
अटूट भरोसा था डाली पर,
धरोहर सौंप थी निश्चिन्त।
विशाल वृक्ष की नियत पर,
नहीं थी शंका किंचित।।
समय-चक्र क्या घुमा,
बिखरा तिनका-तिनका।
टूट गई डाली आँधी में,
अमावस्या सा हाल दिन का।।
खोज रही थी पक्षिणी,
अपने जिगर के टुकड़ों को।
दूर कहीं बिखरे मलबे में,
जीवनदान मिला चूजों को।।
बावरी हो चूम रही थी,
पक्षिणी बिछड़े शिशु को।
डाली-डाली ने पत राखी थी,
सह कर संतप्त ऋतु को।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।