शुभारम्भ! नवरात्रि का हुआ शुभारंभ, 
रुण झुण करती आओ माँ!
शारदीय नवरात्री का हुआ शुभारम्भ,
नौ दुर्गा स्वरूप, दिखाओ माँ|

शरद की अद्भुत छटा निराली,
खिले फूल, मोतियों की बाली!
अमृत कलश भर-भर लाई माई,
रिद्धि-सिद्धि ले घर-घर अंगड़ाई |

छम-छम-छम-छम बाजे पायल,
यौवन-कटार करे तन-मन घायल |
कामदेव-रति प्रणय-क्रीड़ा में लीन,
मानो क्षीर-नीर, एक-दूजे में विलीन|

नवरस वर्षा की सुन्दर बेला है!
ऋतु बसंत भी हुआ अलबेला है!
फूल-फूल मण्डराएँ आसक्त भौरें,
पंखुड़ियों के अंक में डाले हैं डेरे!

नवसृजन आनंदोत्सव का अभ्यस्त,
जग व्रत-त्यौहार, दुर्गा-पूजन में मस्त!
नवचैतन्य से पुलकित ब्रह्माण्ड समस्त,
असुर-खल नायकों से धरा-गगन त्रस्त!

आओ माँ! खड़ग, त्रिशूल धारिणी!
दुष्टों का काल, मात, जगत तारिणी!
महिषासुर मर्दिनी, खल संहारिणी,
काली स्वरूपा, नव दुर्गा, ब्रह्मचारिणी|

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा!


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