भूल कर कजरारी रात सखी,अरुणोदय का स्वप्न सजाए!
प्राची के गुलाबी गालों पर,
अधरों के अमीट निशान बनाएँ!
भीगी पलको में ठहरे मोती ,
अतीत के गुल्लक में भर आएँ!
तन्हा लम्हें, चुभती अनकही बातें,
छोड़ आओ पीछे गुजरे वक़्त सी!
आओ! नव स्वप्न सजाएँ...
मन की मोहन वीणा बजाएँ!
मन-मयूर सा देख बरखा को,
भावविभोर हो सतरंगी पँख फैलाएँ!
आओ! नववर्ष में नव-प्रण लें हम!
माँ प्रकृति का सम्मान करें हम!
पंचमहाभूतों की कर पूजा-अर्चना,
'जियो और जीने दो' की रखे भावना!
कण-कण में राम, पवित्र मन ईश-धाम,
दीन-दुःखियों की सेवा में पाएंगे 'राम'!
आओ! नव-संकल्प से नंदादीप जलाएं,
घाँस-फूंस की कुटिया में ज्ञानदीप जलाएं!
आओ! नव कल्पनाओं के महल सजाएँ...
कुपोषण को हद्दपार कर भविष्य बचाएँ!
विश्व को युद्ध, आतंक से निजात दिलाएं!
श्वेत कबूतरों को नीलें आकाश में उड़ाएं!
बन्धुआ मजदूर को न्याय दिलाएं,
अन्नदाता के आँखों में नवस्वप्न सजाएँ,
श्रमजीवी को आत्मसम्मान दिलाएं,
आओ! मिलजुल मानवता का परचम लहराएँ!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र,