उपलब्धियाँ!
शीर्षक : उपलब्धियाँ!
 
अभिभावकों की सभा में बेटे का नाम सुन वैदेही पुलकित हो उठी! नौवी की परीक्षा में वैभव ने सभी  कक्षाओं में प्रथम क्रमांक प्राप्त किया था! वह फूले न समाई! आस-पास के अभिभावकों की बधाईयाँ गर्व से स्वीकार करते हुए वह हॉल के बाहर बेटे का इंतजार करने लगी! दोस्तों के झुण्ड के बिच शेर सा चल रहा वैभव माँ के करीब आया और उसने कुछ समय दोस्तों के संग बिताने की इच्छा जाहिर की और वैदेही को गेट तक छोड़ कर चला गया! 
घर नजदीक ही था! वह पैदल निकल पड़ी तभी राह में चन्दन जी की दुकान देख उन्हीं के आग्रह पर वह 
वह रुक गई! चन्दन जी ने पूजा की.. अगरबत्ती की सुगंध से वैदेही हर्षित हो रही थी तभी चन्दन जी ने उसके हाथ में पेढ़े का पैकेट रक्खा! उसने प्रश्नवाचक मुद्रा बना कर पूछा, "पेढ़े... किस खुशी में?" तभी अंदर से आई उनकी पत्नी बोल पड़ी," दीदी! बेटा पहली बार सभी विषयों में पास हुआ है न...." 
 
मैं मन ही मन मुस्कुराई! लो जी कर लो बात.... एक अनपढ़ माता-पिता जो अपने वक़्त में शिक्षा-दीक्षा से वंचित रहें, बेटे की छोटी सी उपलब्धि से कितनी  खुशी हुई है न! 
मेरे जुड़े में मोगरे का गजरा महक रहा था और दुकान में मोगरा अगरबत्ती की सुगन्ध! छोटी-छोटी  उपलब्धियों की बूंद-बूंद से उमंग और उल्हास का समंदर हिलोरें मार रहा था... मन के किनारों कों खुशियों की नमी से भीगो रहा था!
 
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!
 
 
 
 
 
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बिल्कुल दिल को छू लेने वाली रचना
  • बहुत ही सराहनीय है। इसे पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई