दोहे!

भवन नया है देख लो, लोकतंत्र का दीप।
संसद सक्षम देश की, सांसद मोती सीप।।

जन गण प्रतिनिधि हैं सभी, जनता की आवाज़।
अरि विरुद्ध है गूँजता, खल रोधक आगाज़।।

भारत जिसमें हैं बसा, आलय सुंदर जान।
सभी कर्तव्य जानते, रखते कब हैं मान।।

संसद गरिमा का किसे, रहता हैं अब भान।
सांसद कुश्ती हैं लड़े, तोड़फोड़ पहचान।।

स्वेद कमाई ढालती, लोकतंत्र का धाम।
सांसद बैठे देखते, रील छोड़ कर काम।।

हंगामा क्यों हैं यहाँ, दागे कौन सवाल।
बात-बात पर देखना, मचता सिर्फ बवाल।।

सब्जी मंडी हैं सजी, आँसू बिकते रोज।
मोल भाव में हैं लगे, घटा अटल सम ओज।।

सर्वोपरि हो राष्ट्र ही, जन-जन की हैं आस।
तोड़ न देना मानवी, जन-मन हिय विश्वास।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत ही सराहनीय है। इसे पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई