संक्रांति, पोंगल, लोहड़ी, माघ बिहू।
खेत-खलिहान में गाए गीत पिहू।।
महके चंपा, बेला, जूही, महुआ बहु।
ऋतु बसंत में सूर्य का ताप सहु।।
दिनकर है उत्तरायण का राही।
खड़ी फसल देख हर्षित माही।।
गुड़-तिल की बन रही मिठाई।
गजक, लड्डू, चिक्की मन भाई।।
'मन्दाकिनी महायोग' है भारी।
देवताओं की प्रभात न्यारी ।।
सौख्य-शान्ति का अदभुत संगम।
रिद्धि-सिद्धि-वृद्धि का स्वर पंचम।।
मिश्री घुले नित बोल बोलना।
अंतस में शहद सी प्रीत घोलना।।
मानवता का अन्तरनाद सुनाना।
जीवन को अतुल्य बना लुभाना।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।