भाग ४७
विभा के माता-पिता पद्मावती जी तथा यशवंतराव जहागीरदार जी आज बहुत खुश नज़र आ रहे थे! एक स्वप्न के यथार्थ के धरातल पर अवतरित होने की स्वर्णिम शुरूआत हो चुकी थी! अप्पा को अपने हॉस्पिटल के लिए जमीन सरकार की तरफ से आबंटीत हो चुकी थी तथा उस पर हॉस्पिटल बनाने की वास्तुविद की रुपरेखा को भी मंजूरी मिल चुकी थी!
पहली बार पद्मावती जी ने विधान भवन देखा था! मंत्री जी से मिलकर, उनकी कार्य के प्रति प्रतिबद्धता देख कर उनके मन के सभी भ्रम छूँ-मंतर हो चुके थे! अप्पा को विश्वास था कि गृहलक्ष्मी जी साथ हैं तो संकल्प लक्ष्मी का आशीर्वाद उन्हें जरूर प्राप्त होगा और हुआ भी!
भोर में उठ कर दोनों ने कुलदेवी तुळजा भवानी की पूजा-अर्चना की और घर के बरामदे में रखी तुलसी की हल्दी-कुंकुम से पूजा कर दोनों चाय-नाश्ता करने बैठ गएँ! अप्पा का चेहरा दमक रहा था! लाली कांदा-पोहे और खारे बिस्किट्स लेकर आई। दोनों कुछ समय तक एक दूसरे से बतियाते रहे, भविष्य के सपने बुनते रहे और फिर गाँव लौटने की तैयारी में जुट गएँ। विभा के कॉलेज से लौटते ही वो निकलने वाले थे अपने घर की ऒर!
कराड जाने का विचार मन में आते ही उनके मन-पंछी की पाँखे खिल उठती!
आखिर क्या जादू था उस उर्वरा धरा में? इसी धरा ने कई सपूत दिए थे जननी जन्मभूमि की निष्काम सेवा के लिए! आबा भी वैसे ही राजनितिक परिवार के वंशवेल का हिस्सा थे! यह वह दौर था जब राजनेता किसी सामाजिक कार्य की शुरुआत के पहले अपने कमिशन तथा नफा-नुकसान की नहीं बल्कि समाज के कल्याण के बारे में सोचते थे। यह राजनेताओं की वह पीढ़ी थी जो राजनीति को पुरखों का पेशा नहीं बल्कि माँ भारती का कर्ज उतारने का अनूठा मौका समझ अपनी धन-सम्पदा को जन-जन के कल्याण को समर्पित कर स्वयं को भाग्यशाली मानते थे। उनके पास पुरखों की वह थाती थी जो देश की स्वतंत्रता के यज्ञकुण्ड की समिधा बन कर अपनी जवानी, धन-सम्पदा देश को अर्पित कर चुकी थी। यें वो भारत माँ के सपूत थे जो देश पर अपना सब कुछ नौछावर का हर पल समाज के उत्थान के लिए कार्यरत रहते थे। जनता-जनार्दन की सेवा ही उनकी देव-पूजा थी।
दुर्घटना के बाद विभा के साथ-साथ सभी बच्चों के इलाज में आई समस्याओं ने उन्हें अन्तरमुख कर दिया था! अपने बच्चों के कुशल-मंगल की जद्दोजहद में लगे यशवंत राव का मन उन्हें बार-बार यहीं सवाल पूछता, " अप्पा! तुम्हारे जैसे साधन-सम्पन्न परिवार को अगर स्वास्थ्य सेवाएं पाने में इतनी दिक्कते आ रही हैं तो एक गरीब, खेतिहार, मजदूर, कम आमदनी वाले परिवार की क्या दशा होगी? कितने लोग असमय ही काल की गर्त समा जाएंगे? क्यों नहीं उनके लिए कुछ करने का प्रयास किया जाय? क्या काम की वह दौलत, सम्पन्नता जो किसी जरुरतमंद के दुःख-दर्द को कम न कर सकें, किसी पीड़ित-शोषित के आँसू न पोंछ सकें?
अवचेतन मन की इसी फटकार ने उन्हें इस क्षेत्र में एक सुविधा-सम्पन्न अस्पताल बनाने के लिए प्रेरित किया था!
उनके इस नेक विचार का पद्मावती जी ने भी खुल कर समर्थन किया था! पत्नी जब अपने पति का अच्छे कामों में समर्थन-सहयोग करती हैं, उसे धर्म-कर्म के क्षेत्र में आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती हैं तभी तो वह धर्मपत्नी कहलाती हैं न!
विचारों में खोये अप्पा और पद्मावती जी दरवाज़े की बेल से सचेत हो गएँ। जैसे ही लाली ने दरवाजा खोला, विभा आ कर माँ से लिपट गई। आज बिना विलम्ब किए वह घर लौट चुकी थी! उसने अप्पा का अभिनन्दन किया और उन्हें जादू की झप्पी देकर कहा, " मुझें आप पर गर्व हैं अप्पा!"
अप्पा और पद्मावती जी की आँखें नम हो गई! उन्होंने विभा और लाली को जल्दी से भोजन करने को कहा और दोनों कुछ समय के लिए आराम करने अपने कमरे की ऒर चले गएँ।
आज फिर नितीन सर ने यश और विभा को शाम को प्रैक्टिस के बाद घर बुलाया था! विभा जानती थी वो यश से लखनऊ जाने के बारे में बात करना चाहते होंगे! विभा दुविधा में फंसी हुई थी! दोनों आसमान में स्वच्छन्द उड़ना चाहते थे लेकिन उन्होंने अपने पैरों को रस्सी से एक-दूजे से बाँध दिया था! आखिर उड़ान तो अपने ही बल पर भरनी होगी न ... पैरों में बँधी जंजीरे कब आकाश छूने देती हैं परिंदों को! उसने दृढ निश्चय कर मन को कड़ा किया! मन ही मन वह बोल पड़ी, "यें कैसा प्यार जो ऊँची उड़ान भरने को तैयार पक्षी के पँख कांटने को आमादा हो? मैं यश को प्रोत्साहित करुँगी बाज सा आकाश छूने को! अवरोध, बाधाएँ कहाँ नहीं आती? मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनना है तो वनवास स्वीकारना होगा, गतिमान मछली की आँख का सन्धान करना है तो कर्मयोग के यज्ञ की समिधा बनना ही होगा, सीता सा कुन्दन बन चमकना है तो अग्नि परीक्षा देनी ही होगी, स्वतंत्रता का मोल जगत को समझाना है तो महाराणा सी घाँस की रोटी खानी होगी और हिन्दू राष्ट्र का परचम लहराना है तो सह्याद्री की वादियों में शिवबा सी जवानी खपानी ही होगी!
आसान है क्या देश के लिए पैरालिम्पिक में तमगे जीतना?
कितनी जीवट, जिद्द, जद्दोजहद चाहिए लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए! भाग्यशाली है यश और मैं कि हमें खुद को साबित करने का मौका मिल रहा है और ऐसे सुनहरे मौके को भावनाओं के दलदल में फँस कर गँवा दूँ? इतनी स्वार्थी कैसे हो गई हूं मैं? वह खुद को धिक्कारने लगी तभी लाली चाय और मठरी लेकर आई और अप्पा और माँ नाश्ता कर निकलने को सज्ज हुएं प्रस्थान के लिए...
विभा खुद को संभाल चुकी थी! विचारों की सुनामी का जोर धीमा पड चूका था। उसने माता-पिता को प्रणाम किया और अब वो निकलने वाले ही थे कि यश का फोन आया। उसने अप्पा को बधाई दी और विभा से छ: बजे बैडमिंटन कोर्ट पहुँचने के लिए कह कर उसने फोन रख दिया! वैदेही और वज्र भी कहाँ पीछे रहते? उन्होंने भी अप्पा और पद्मावती जी को शुभयात्रा की मंगल कामना की और विभा से 'ऑल द बेस्ट' कह कर फोन रख दिया!
अप्पा के कॉल करते ही पांच मिनिट में ड्राइवर आ गया और सामान गाड़ी में रखने लगा! अप्पा और विभा की मम्मी गाड़ी में बैठ चुके थे! विभा के अलविदा कहते ही गाड़ी तेज रफ़्तार घोडों की तरह भागने लगी और कुछ ही पल में विभा की आखों से ओझल हो गई।
फलक पर एक मंजर धुंधला हो चूका था और दूसरा उभरने का इंतज़ार कर रहा था! कुछ समय विश्राम कर वह तैयार होने लगी तभी उसकी नज़र लाली पर पड़ी!
" इतना सज-धज कर कहा जा रही हो लाली? " विभा पूछ बैठी! "कहीं नहीं दीदी! बस! आप जाएंगे उसके बाद मैं सब्जी-फल लेने जाऊंगी न मार्केट में... "
विभा उसे देखती ही रह गई! यौवन की दहलीज लाँघने को तैयार किशोरी का अंग-अंग दमक रहा था। गेहूंआ वर्ण एक विरली आभा बिखेर रहा था! अप्पा ने पिछली बार लाया पंजाबी सूट उस पर खूब फब रहा था! आजकल इसका मन पढ़ाई में कम और साज-श्रुँगार में ज्यादा लग रहा था! यौवन का नशा और उम्र का सोलवा पड़ाव वैसे भी भ्रमित करनेवाला ही तो होता है न! मन के कोमल आँगन में मौसम के करवट बदलते ही धरा पर बिखरे पराग कण जरासी प्यार की नमी पाई नहीं कि धरती का सीना फाड़ दुनिया देखने को लालायित हो जाते हैं!
विभा एकटक उसे देख रही थी! मन में असंख्य नागफनी के पौधे अचानक उभर आएं थे। कहीं यह किसी लड़के के चक्कर में तो नहीं पड़ गई? वो पड़ोस का फूलवाला आखिर कोई न कोई बहाना बना कर बार-बार क्यों आ रहा है घर के द्वार पर?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...