अपनाओ वहीं जो सर्वथा हो सही,दिल की सुनू या दिमाग़ की कही?
क्यों पचड़े में पडू क्या हैं गलत-सही
करुँ वही जो दिमाग़ का न करें दही!
ज़िन्दगी हैं ऊपरवाले का उपहार,
तर्क-वितर्क में जाया क्यों हो बहार?
मन का करूँ या करूँ प्रभु मनुहार,
होगा वहीं जो किस्मत को हो स्वीकार!
कहाँ हैं मंजिलों का अता-पता ,
ढूंढ़ते रह गएँ चाँद-तारों की दास्तां!
दम तोड़ने लगी साँसों की अहमियत,
खोखली लगे शान्तिदूतों की नियत।
महामारी ने लील ली कई जानें,
फिर भी महाशक्तियाँ कहाँ मानें?
दफ़न हैं राख में बच्चों के खिलौने,
कराह रही मलबे पर बैठ खातूनें।
क्या जी पाएंगे खुद को सवाल कर?
मुस्कुरा पाएंगे मिसाईलों के ढेर पर?
सह पाएंगे महाशक्तियों का हाहाकार?
मानवता को शर्मिंदा करती चित्कार?
क्या आसान हैं अधो:पतन स्वीकारना?
असत्य के चेहरे से मुखौटे उतारना?
अपनाना सर्वथा जो निष्पक्ष-सही,
लिखना खरी-खरी मनुज-खाता-वही!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।