जीवन का गणित

विधा: व्यंग्यात्मक छंद मुक्त काव्य 

शीर्षक: काश! इंसान इंसान नहीं..


काश ! 

इंसान इंसान नहीं  कोई सुंदर 

पंछी यानी 

परिंदा होता तो कितना 

अच्छा होता !!


कौन लगाया यह 

#जीवन का #गणित, कि मानव 

जन्म ही श्रेष्ठ है ?

तो फिर सबसे ज्यादा 

मानव ही क्यों रोता?


मैं तो कहता हूॅं 

काश ! 

इंसान इंसान नहीं  

कोई सुंदर 

पंछी यानी 

परिंदा होता तो कितना 

अच्छा होता !!



कल्पना तो करो 

कितना आजाद कितनी स्वच्छंदता 

से अपने 

आप निरंतर 

नभ में उडता होता !!


न सोच न विचार, 

न अहम न वहम, 

न भ्रम, न रोक न टोक, न कोई 

परिवेश न पहरा न परिधी 

 सारी सरजमीं 

सारा आसमां 

उसका घर होता !!



काश ! इंसान इंसान नहीं  सुंदर 

पंछी यानी  

परिंदा होता तो कितना 

अच्छा होता !!


मैनें देखा है 

सामान्यतया हर पत्नी 

कम या ज्यादा अधिकारिक तौर पर 

पति को कहती

उठो वाॅक  करो, ये मत खाओ, 

वो मत खाओ !! 

कल कहाॅं गये थे? 

वहां नहीं जाना था ?


ये ले आना , वो ले आना,

यह तो हरगिज मत लाना !!

गुमसुम रहे तो 

कहे जरा टाॅक करो 

टाॅक करे तो 

कहे आवा्क रहो।


गंभिरता से कुछ सोचे तो कहे 

आप जोक करो

जोक करे तो, कहेगी कि बस 

अब अपना 

मुॅंह लाॅक करो।


ये पहनो वो पहनो 

ये फबेगा! मैं कहती हूं न ?

यही जचेगा

ये पैंट घीस गया है ये शर्ट 

इसपे नहीं जाती !

किसी मिटींग में गये तो तपाक से 

कह देती 

कि चुप रहना

आपको बोलना कुछ नहीं आता!

किसी की बातो 

या बहकावे में 

आ जाओगे तुम

तुम्हारा एक दम ही ढीला है खाता

इसलिऐ 

सोचता हूॅं कि

काश ! इंसान सुंदर पंछी या 

परिंदा होता,तो कितना 

अच्छा होता !!


समान्यतया पति नाम का 

प्राणी भी तो वैसा ही है 

प्रायः हर बात पर अपना 

रूआब ठोकता 

सुबह शाम कोल्हू के बैल की 

तरह खटती पत्नी,

 फिर भी पति 

नजर में निखट्टी

उपर से कुछ तो 

बेहूदो की बिल्कुल  

बेहूदी गालियां बीमार मानसिकता 

व बेरहमों की 

मार सहती और आपस 

में ऐसी ठनती

फिर आंखो से 

गंगा जमनी बहती।


पति की मारी बिचारी 

किसको कहती

दिन रात दिल 

की आग मंद मंद 

सुलगती

बताये आप बीती तो गांव मोहल्ले  

तक आंच लगती

और बस खून के 

आंसू पीती इसलिऐ 


सोचता हूं काश!

इंसान सुंदर पंछी या परिंदा होता 

तो कितना अच्छा होता !



न वैध न हकिम न डायटीशियन कहता 

कम खाओ  

ये लो वो लो 

मोटे हो, दुबले हो

बाल झड़ रहे है, झुर्रियाँ पड रही है 

ध्यान नहीं रखते 

तोंद बढ रही है ।


और लकवा ह्रदयघात 

या कैंसर काॅरोना का 

बतौर पर 

न कोई खौफ़ होता,

काश !इंसान सुंदर पंछी या परिंदा होता

तो कितना अच्छा होता !!


न टंटा न  झगडा न जर न जोरू 

न बाॅंट न बटवारा

न कुंजी न कपाट न मकान न मठ

जिये जब 

तक ठाठ होता !!


किसी बात पर न 

कुठाराघात होता!!


न फिक्र अबंर की 

न चण और चारे की चिंता 

तन ढकने के लिऐ 

उसके पर या पंख ही पर्याप्त होते 

और चुग्गे और 

चर के लिऐ एक चोंच 

लहलहाते खुले 

खेत खलीयान ।


और वह दहेशत विहिन दिगम्बर होता !!

काश !

इंसान इंसान 

नहीं सुंदर पंछी या 

परिंदा होता

तो कितना अच्छा होता !

न कर्फ्यू न लाॅकडाऊन 

करोना भी हो जाय

तो न रोना -धोना न 

इतनी राजनीति और न इतना भी 

कोलाहाल या 

हा हा कार होता !!



मानता हूॅं होता खतरा 

उसके हक जीवन को किन्हीं 

अन्य प्राणीयों से भी तो

पर उसका कोई न गिला न 

शिकायत न 

कोई शिकवा होता !!

काश!इंसान सुंदर पंछी या परिंदा होता

तो कितना अच्छा होता!!!!


स्वरचित :अशोक दोशी

सिकंदराबाद (तेलंगाना)


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