क्या करूँ! चल रहे वर्षों से हैं जिसके लिए 
वो दूर कितने जिंदगी के छोर हैं,
सीधा रहे तो तेज थोड़ा चल सकूँ 
इस रास्ते में और कितने मोड़ हैं, 

सुनता हूँ सब भागते थक जाते हैं 
मैं थक रहा हूँ चाल धीमी चलने से, 
यदि दिख रहा है छाँव वीरां रास्ते में 
मृगतिषा है बस मरू की, धूप जलने से 

क्या करूँ!
अफ़सोस? 
कि मंजिल दूर तक दिखती नहीं या 
संतुष्ट हो जाऊं कि कोशिशें पूरी रहीं।

महासमर है, ये समय जो चल रहा है
चक्रव्यूह में अभिमन्यु सा उलझा पड़ा है,
न कवच-कुण्डल है, न कोई सारथी है 
अब रण में बस, मन अकेला ही खड़ा है, 
क्या करूँ!
अब दिख रही इस हार को स्वीकार लूँ या 
लड़ते रहूँ और सपने को नया आकार दूँ।
#life #lesson

द्वारा Akash Pandey
Shared23 Mar 2026
Start 22 Mar 2026
End 22 Mar 2031
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • वाह! बहुत खूबसूरत द्वन्द! 🙏🙏
  • बहुत खूब वीणा जी! पुरानी स्मृतियों में आँसू और मुस्कान का इंद्रधनुषी जलवा नज़र आता हैं।