भाग ६५
मोबाइल के अलार्म से विभा उठ चुकी थी। साढ़े छ: बजे वज्र के यहाँ पहुंचना था। विभा ने खिड़की से बाहर झांका। चन्द्रमा अभी भी भोर का इंतज़ार कर रहा था। प्राची की मुस्कुराहट ने जैसे ही लाल-केसरियां फूलों की वर्षा की...निशा को अकेली छोड़ चाँद सब को अलविदा कह कर चल पड़ा परदेस की ऒर। सूरज की सहस्त्र रश्मियों का स्वागत करने से पहले ही विभा और यश निकल पड़े वज्र के घर की ऒर।
जानकी जी, छोटू, अन्नपूर्णा, वज्र और वैदेही गाड़ी में बैठ चुके थे और ड्राइवर ने सामान डिक्की में डाल दिया था। तभी विभा और यश भी पहुँच गएं। यश के लिए आगे की सीट सुविधाजनक होगी यह सोच कर वह सीट वज्र ने खाली रक्खी थी। विभा, वैदेही वज्र और जानकी जी बिच में बैठे और छोटू और अन्नपूर्णा पीछे की सीट पर आराम से बैठ गएं।
मार्ग के दोनों तरफ के वृक्ष पीछे की ऒर दौड़ रहे थे और गाड़ी आगे की ऒर। गाड़ी ने अब द्रुतगाती मार्ग पकड़ लिया था। तेज रफ़्तार से गाड़ी पुणे की तरफ बढ़ रही थी। जानकी जी गायत्री मन्त्र का जाप कर रही थी तो वैदेही नींद ले रही थी। विभा और यश 'लख़नऊ अकादमी' की बातें कर रहे थे तो वज्र अपने दादाजी भास्कर राव की यादों में खोया हुआ था। गाड़ी अब लोनावला से आगे निकल चुकी थी। गाड़ी सोमाठाणे नाके पर पहुंची ही थी कि ड्राइवर ने जोर से ब्रेक मारा। सभी जोर के धक्के से नींद से जाग चुके थे। आगे की गाड़ी ने ओवरटेक करते हुए अपने आगे की गाड़ी कों इतनी जोर से धक्का मारा कि वह अपना संतुलन खो कर सडक किनारे पे खड़े वृक्ष को जोर से टकरा गई। धक्का इतना जबरदस्त था कि गाड़ी का आगे का कांच का हिस्सा चकनाचूर हो गया और आगे बैठी युवा जोड़ी घायल हो कर गाड़ी से बाहर फ़ेंकी गई। वज्र ने ड्राइवर को गाड़ी रोकने कों कहा। ड्राइवर डर रहा था कहीं वो पुलिस वगैरे के चक्कर में न फंस जाये।
वज्र ने फिर से उसे गाड़ी बाजू में लेकर रोकने कों कहा और सभी नीचे उतर गएं। सामने का दृश्य ह्रदयविदारक था। युवा को सिर को चोट लगी थी और वह बेहोश पड़ा था और युवती के शरीर पर कई जगह चोट लगी थी लेकिन वह होश में थी और कराह रही थी।
सभी उनकी मदद में जुट गए। तब तक वज्र ने इमरजेंसी नंबर पर कॉल कर पुलिस को बुला लिया था। पुलिस भी वहाँ समय रहते पहुँच चुकी थी और घायलों कों जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचने के लिए यश और वज्र ने पुलिस की अनुमति भी ले ली । तब तक एम्बुलेंस भी आ चुकी थी। पुलिस ने पंचनामा वगैरे की औपचारिकता हॉस्पिटल में निभाई क्योंकि दुर्घटना में घायल लोगों की जान बचाना प्रथम कर्तव्य था। विभा और यश दोनों को एम्बुलेंस में डाल नजदीकी हॉस्पिटल 'निरामयी हॉस्पिटल' की ऒर निकले और पीछे पीछे पुलिस की गाड़ी तथा वज्र की 'फॉर्चूनर' गाड़ी। गाड़ी में जानकी जी ने आबा को फ़ोन कर कुछ देरी होने के संकेत दे दिए और सभी हॉस्पिटल में पहुँच गएं।
दोनों का खून भी बहुत बह चूका था। उनके लिए खून की आवश्यकता थी। डॉक्टर ने इलाज शुरू कर दिया था और खून की व्यवस्था करने कों कहा। विभा और यश ने बाकी सब को आगे जाने के लिए कहा और वह और विभा वहाँ रुके ताकि पीड़ित, जख़्मी की मदद कर सकें और वज्र समय पर प्रार्थना सभा में पहुँच सकें। सभी के बहुत समझाने के बाद वज्र, वैदेही और जानकी जी सब आगे निकल गए और विभा और यश हॉस्पिटल में रुके।
यश का ब्लड ग्रुप O+ था। डॉक्टर ने उसका खून लिया और एक पैक हॉस्पिटल की ब्लड बैंक से लेकर दोनों कों चढ़ा दिया। दोनों अब खतरे से बाहर हैं ऐसा डॉक्टर ने कह दिया था। पुलिस की टीम ने तब तक उनके मोबाइल से परिजनों का नंबर निकाल कर उन्हें अवगत करा दिया था। पूना में उनके रिश्तेदार थे। वो कुछ ही समय में पहुँचने वाले थे। पुलिस भी इन युवा बन्दों की फुर्ती तथा व्यवस्थापन के गूर देख अचंभित थी। आज उनकी सजगता और समयनपर किए कार्य ने दो युवा जिंदगियों को नया जीवन दिया था।
रिश्तेदारों के आते ही विभा और यश ओला कर निकल गए सासवड की तरफ। वज्र ने घर का पता व्हाट्सअप कर दिया था।
आज विभा और यश को खुशी थी कि वो किसी के काम आ सकें। बीता हुआ कल उन्हें रह-रह कर याद आ रहा था। "अगर उस वक़्त हमारी मदद किसी ने न की होती तो क्या हम यह कार्य करने के लिए जिन्दा होते?" उनके मन में यहीं सवाल बार-बार आ कर उन्हें झकझोर रहा था लेकिन आज उन्हें आत्मसंतोष की अनुभूति हो रही थी।
'दोनों अपरिचितों की जान बच गई हैं और वो दोनों आधे घण्टे के भीतर गंतव्य की ऒर निकलने वाले हैं' यह यश ने आबा और वज्र को खुशखबरी दी।
'फॉर्चूनर' सासवड़ पहुँच चुकी थी और विभा और यश मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। ऐसा लग रखा था मानों वज्र के दादाजी बच्चों की परीक्षा ले रहे हो। आबा भी बच्चों की कोशिशों से प्रभावित हुएं। आबा ने सब को घर पर ही आने को कहा था। जिन्हें चिरप्रयाण को निकलना था वो तो वज्र की जिम्मेदारी आबा कों सौंप कर निकल चुके थे लेकिन आबा को तो वज्र की तबियत का खयाल रखना था। रिश्तेदार-हितचिंतकों की भीड़ से उसे जीतना हो सकें उतना दूर रखना ही उचित था।
द्रुतगती मार्ग पर हुई इस दुर्घटना से सब के मन में उदासी छाई थी बाकी रही-सही कसर आजोबा को याद कर आँसू बहाते स्नेहीजनों ने पूरी कर दी थी। माहौल गमगीन था। दुःख की घड़ी में परिवार को मानसिक सबाल देने सभी उपस्थित थे।
विजयश्री के वन्दनवार से सजी कल की खुशियाँ आज काफूर हो चुकी थी लेकिन राहत की बात यहीं थी कि दुर्घटना में घायल युवा दंपत्ति की जान बच चुकी थी। किसी घर के कुलदीपक की जीवन-ज्योति कुछ समय फड़फड़ा कर बुझने से पहले स्नेह की चंद बूंदों से फिर जगमगा उठी थी। घर की लक्ष्मी राह में ठोकर खा कर गिर पड़ी थी! खून से लथपथ होने के बावजूद अपने सुहाग की रक्षा करने मदद की गुहार लगा रही थी वह भी अब राहत की सांस ले रही थी। वज्र के आजोबा की प्रार्थना सभा में उपस्थित होने जा रहे थे तब आजोबा शायद मित्र मण्डली कहना चाह रहे थे, "बच्चों! आडम्बर में नहीं मानवता की रक्षा में ध्यान दो। जो जा चूका हैं इस दुनिया से उसके नाम पर कर्मकांड करने से ज्यादा जरुरी हैं, जो जिन्दा हैं उनका खयाल रक्खो, उनकी सेवा करों। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं और सेवा से बड़ा कोई धार्मिक कर्म नहीं!"
यश और विभा सही समय पर सासवड़ पहुँच गए। दोनों के आते ही सभी प्रार्थना हॉल की तरफ निकल पड़े। मध्य में हार डाल कर वज्र के दादाजी की आकर्षक फोटो रखी हुई थी। फोटो के आगे अखंड दीप जल रहा था।
लोग-बाग आ-जा रहे थे। घर के सभी आप्तजन सफेद परिधानों में पहली पंक्ति में मेहमानों की ऒर मुँह कर बैठे थे। सभी आ कर आजोबा की फोटो पर गुलाब का फूल चढ़ा कर, फोटो कों हाथ जोड़ कर, आप्त स्वजानों की ऒर देख हाथ जोड़ कर, संवेदनाएं व्यक्त कर अपना-अपना स्थान ग्रहण कर रहे थे। धीमे स्वर में गायत्री मंत्र का पाठ हो रहा था। गाँव के सरपंच जी तथा प्रतिष्ठित नेता जी ने आजोबा के समाज कार्यों का बखान कर, उनके दिलदार व्यक्तित्व को याद कर उन्हें तहेदिल से श्रद्धांजलि अर्पित की और उनकी थाती को आगे बढ़ाने की विनती की। आबा ने बाबा की पुण्यस्मृति में रुपएं एक्कावन हज़ार गौशाला को दान दिए।
अंत में आजोबा की आत्मा को मोक्ष प्राप्त हो इसलिए प्रार्थना की गई और दो मिनिट का मौन रख कर प्रार्थना सभा सम्पन्न हो गई।
प्राथना सभा में उपस्थित लोग उनका उल्लेख 'देव माणूस'
कर के कर रहे थे। सभी भद्रजनों की आँखें नम थी। आजोबा की यहीं तो ज़िन्दगी भर की असली दौलत थी। द्वार पर आया जरूरतमंद व्यक्ति द्वार से कभी खाली हाथ नहीं गया था और इसी पर आबा को गर्व था।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में.....