ये प्यार ही तो ज़िन्दगी...
भाग ८८

यश की द्वितीय चयन प्रक्रिया के मैच शुरु हो चुके थे। देश के कोने-कोने से आएं खिलाडियों में स्पर्धा थी। इस स्तर पर खेलने का मतलब था काबिल खिलाड़ियों में अपने आप को बेहतर साबित करना। आज यश जी-जान से लगा हुआ था। उसके दिलों दिमाग़ पर देश के लिए खेलने का जुनून सवार था। उसके बिच में वह न तो अपनी अपंगता को आड़े आने दे रहा था न अपनी मानसिक कमजोरियों को।  
सुबह की सैर पर निकला यश अब अकादमी के कोने- कोने से वाकिब हो चूका था। मंद-मंद बहती बसन्ती बयार मन को तरोंताजा कर रही थी। पेड़ों की पत्तियाँ झूम-झूम कर ख़ुशी का इजहाऱ कर रही थी। गौरय्या ठुमक-ठुमक कर चल कर दाने चुग रही थी और परिंदे कुछ विश्राम कर नीले आकाश में ऊँची-ऊँची उड़ान भर रहे थे। 

लख़नऊ अकादमी में देश के युवा खिलाडियों को पैरालिंपिक खेलों के लिए तैयार किया जाता था। उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए गौरव खन्ना सर सदैव उपलब्ध रहते थे। वो खुद दिव्यांग थे लेकिन खेलों के प्रति उनका जुनून जबरदस्त था। एक ख़्वाब उनके दिल के फलक पर अक्सर उभरता था जिसमें वो रंग भरने को बेताब थे। दो ओलिंपिक खेलों में बैडमिंटन में मेडलों की बरसात यूँही नहीं थी। यह उनके कोचिंग का ही असर था कि देश के लिए कई मेडल उनके विद्यार्थियों ने हासिल किएं थे। लोग-बाग का ध्यान मेडल जितने के बाद खिलाडियों की तरफ जाता है लेकिन खिलाडी ऐसे ही नहीं तैयार होते है। पूरी ज़िन्दगी लगा देनी पडती है उन्हें और उनके कोच को तब कहीं जा कर एक तमगा देश के नाम कर पाते है।

क्या क्या नहीं किया था उन्होंने इस अकादमी को स्थापित करने के लिए! कहीं पैसे की कमी, कहीं संसाधनों की कमी, कभी अहंकार का टकराव तो कभी ईर्ष्या वश अच्छे खिलाडी की तरफ भेदभाव पूर्ण रवैय्या। क्या क्या अडचनें नहीं आई मंजिलों की ऒर बढ़ते-बढ़ते लेकिन वो खिलाडी ही क्या जो अवरोधों को देख कर डर जाये, अपना मार्ग बदल दे!

गौरव सर के जुनून और लगन ने सब को सोचने पर मजबूर कर दिया। सरकार के क्रीड़ा मंत्री, अधिकारी भी सोचने लगे कि अगर एक दिव्यांग व्यक्ति इतनी जद्दोजहद देश का नाम ऊँचा करने के लिए कर सकता है तो फिर हम क्यों नहीं? देश हमारा है, उसकी कमियों को हमें ही दूर करना हैं।

यह यश की खुशकिस्मती थी कि यश गौरव सर की नज़र में आ गया था। उन्हें विश्वास था कि यश देश का नाम जरूर उज्जवल करेगा अगर उसे सही प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, डॉक्टरी सहायता और संसाधन मिल जाएं।

आज शाम से प्रतियोगितायें शुरु होने वाली थी। यश ने आज ज्यादा प्रैक्टिस नहीं की थी। वह खुद को तरोताजा रखना चाहता था। वह अपनी ऊर्जा को समेट कर शाम के मैंच के  लिए सुरक्षित रखना चाहता था। प्रतिस्पर्धा तगड़ी होगी यह निश्चित था और उसके लिए दमखम भी उतना ही जरुरी था। 

पहली मैच उसके दोस्त भास्कर की थी। पिछली चयन प्रतियोगिता के समय ही यश की उससे दोस्ती हुई थी। हैदराबाद के इस बन्दे को पुलेला गोपीचंद जैसे कोच का भी मार्गदर्शन मिला था। वह खेल की बारीकियों को समझ कर अपने खेल में सुधार करता था। साधारण ऊँचाई का यह खिलाडी अक्सर अपनी कम ऊँचाई के कारण नेट पर मार खाता था। उसका मैच तमिलनाडु के 
रामानुज के साथ था। वह था तो साधारण सा कदकाठी वाला लेकिन था बहुत चपल! प्रतिद्वंदी को दौड़ा-दौड़ा कर थकाने में माहिर था। यश ने दोनों को शुभेच्छाएँ दी और मैच के शुरु होने का इंतज़ार करने लगा।

अब गौरव सर, अम्पायर, और खिलाडी सभी हाजिर थे। मैच शुरु होने को सिर्फ दो मिनिट कम थे। दोनों खिलाडी कोर्ट पर थे खेलने के लिए तैयार खड़े और अगले ही पल मैच शुरु हो गया। भास्कर की सर्विस मंझी हुई थी। दो अंक तो उसने सर्विस के ही लिए। तीसरे में रामानुज की प्लेसींग काम आई और सर्विस रामानुज की ऒर आई। उसकी अपनी ही स्टाइल थी। एकदम पीछे से वह ऊँची सर्विस दे रहा था और भास्कर को शटल पर नज़र जमाएं रखने में समस्या आ रही थी। इसी चक्कर में उसका संतुलन बिगड़ा और वह कोर्ट पर गिर पड़ा। यश उसकी तरफ दौड़ पड़ा। उसने उसे उठने में मदद की। वह भी न जानें किस मिट्टी का बना था। दो मिनट के बाद वह फिर उठ कर खड़ा हो गया। उसकी इसी जिजीविषा ने उसे विजयश्री को अपनी ऒर खींच लाने की ताकत दी।

भास्कर सीधे सेटों में ही मैंच जीत गया। यश ने उसका अभिनन्दन किया और चल पड़ा अपने कोर्ट की ऒर! इस अकादमी में इनडोअर स्टेडियम में दो कोर्ट थे। दोनों तरफ दर्शक दीर्घा थी और पांच सौ के करीब दर्शकों के बैठने की क्षमता थी। 

सभी सुविधाएँ  वैश्विक स्तर की हो इसका पूरा ध्यान रक्खा गया था ताकि किसी भी खिलाडी को विदेशों में खेलने में असुविधा न हो। यह अकादमी पैरालिम्पिक खिलाडियों के लिए ही सिर्फ बनी हुई थी। उनके लिए अध्यायतन संसाधनों से लैस अस्पताल था जिसमें दिव्यांग बच्चों के लिए खास सुविधाएँ थी। यहाँ जो कृत्रिम पैर, हाथ वगैरा अंग उपलब्ध थे वो विश्व स्तर के सब से बेहतरीन कृत्रिम अंग थे  जिससे खिलाडी को उसके साथ खेलने में कम से कम तकलीफ  होती थी। 

खेल-खेल की जगह था और नई तकनीक उसे और बढियाँ बनाने में योगदान दे रही थी। यश के मैच के लिए नाम पुकारे जा चुके थे। यश भी पूरी तैयारी के साथ उतरा था। आज का मैच उसके भविष्य के लिए जीतना बहुत जरुरी था। यह एक मैच उसके जीवन में संभवनाओं के असंख्य दरवाज़े खोलने का दम रखता था।

यश के लिए यह मैच अति महत्वपूर्ण इसलिए भी था कि सामने वाला खिलाडी भारत का सब से बेहतरीन खिलाडी था। वह रात-दिन उसके मैच के वीडियो देखता। उसकी कमजोरी का पता लगाने की कोशिश करता। 

नितीन सर ने उसी के खेल को यश को दिखा-दिखा कर उसकी तैयारी कराई थी। उसका बैक हैंड कमजोर था। खेल की तकनीक तो यहीं कह रही थी कि कमजोर क्षेत्र पर प्रहार करों! 

यश का मैच शुरु हो चूका था। शुरुआत में ही उसने बढ़त हासिल कर ली थी। उसकी नेट के करीब से जाती तेज सर्विस को वापस करना मुश्किल काम था। एक अनुभवी खिलाडी के भी यश ने नाक में दम कर रक्खा था। अपेक्षा के अनुरूप मैच बिल्कुल नहीं हुआ। यश बहुत कम समय में जीत हासिल करने में कामयाब हुआ। उसका आत्मविश्वास बहुत बढ़ चूका था। पिछली बार की तरह उसने न तो जल्दबाजी की न खेल पर अपनी पकड अंतिम क्षण तक ढीली छोड़ी।

नतीजा सामने था। यश सीधे सेटों में मैंच जीत कर मस्त मौला सा स्टेडियम में रैकेट लहराता बाहर आया। यह जीत यश के लिए बड़ी जीत थी, उम्मीदों के असंख्य दीप प्रज्वलित करती जीत थी।।

यश खाना खा कर कुछ समय तक रिलेक्स हो रहा था कि विभा का फ़ोन आया। " हाय हैंडसम! कब आ रहा मुम्बई? कॉलेज की गलियाँ सूनी हो गई यार! कब आ रहा है ? "

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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