“महाकुंभ"
बाहर से गंगा स्नान और अंतर्मन मलिन काफ़ी है...
सोचते हैं कुछ लोग गंगा स्नान से हर पाप की माफ़ी है...
पुण्य का दिखावा करने वाली वो भीड़ कुचल कर कुछ मासूम पाप यहां कर जाती है...
क्या सच में पवित्र होने को गंगा स्नान काफ़ी है...?
छुपा कर असली रूप लोग यहां, आडंबर करते आरंभ हैं....
इंसान से इंसानियत कुचली जा रही, ये कैसा महाकुंभ है...!
दूसरों का निवाला छीन कर खाने वाले भी गंगा नहाने आते हैं...
बस कपड़े हैं साफ़, कपट से भरे कुछ लोग भला पवित्र कैसे कहलाते हैं..?
ये कलयुग के इंसान, इंसान के नाम पर कलंक और निंदा हैं...
नापाक इरादें लिए करते पवित्र गंगा को भी शर्मिंदा हैं...
नफ़रत, छल से है मन मलिन, भरे हैं अभिमान से...
गंगा मात्र पानी है इनके लिए कैसे पवित्र होंगे गंगा स्नान से..!!
– जानवी कारयानी