ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.. भाग ४१
भाग ४१

अभी-अभी किरणों के रथ से उतरे सूर्य देवता के दर्शन कर सभी प्रसन्न थे। असीम फैला समंदर, क्षितिज को चूमता व्योम और चंचल सागर की लहरों से बतियाते शुभ्र-धवल बादल अनायास ही सृष्टि के अनुपम सौंदर्य की मनमोहक अदाओं की ऒर ध्यान आकर्षित कर रहे थे। एक तरफ स्वीमिंग पूल, सूर्य स्नान के बाद तनावरहित हो कर आराम करने के लिए लगे पलंग और दूसरी तरफ अथांग फैला महासागर जिसकी न तो गहराइयों का अता- पता था न अंतिम छोर का! बीच-बीच में आसमान में उड़ान भरते पक्षी और सूरज की किरणों की जगमगाहट में चमकता पानी! सभी अतिथि प्रसन्नचित थे।

सभी समय पर तैयार होकर हॉटेल के भोजन कक्ष में नाश्ते के लिए पहुँच चुके थे! आबा, प्रतिभा जी, जानकी जी भी हॉटेल में ही रुके थे। रात को ही सुबह-सुबह जा कर स्वयंभु सिद्धिविनायकजी के दर्शन की योजना बन चूकी था!  नाश्ते में व्यंजनों की फेहरिश्त हॉटेल की अपनी थी! सभी नें झटपट नाश्ता सम्पन्न किया और 'ट्रेवलर' में निकल पड़े सिद्धिविनायक मन्दिर की ऒर! वैसे मन्दिर हॉटेल से करीब ही स्थित था। सुबह-सुबह विघ्नहर्ता के दर्शन की कल्पना मात्र से सभी बहुत उत्साहित थे!
सुन्दर, अति भव्य मन्दिर के प्रांगण में पहुँच कर वीरबहादुर सिंह जी और राजरानी जी बहुत ही हर्षित हुएँ! आबा के इस प्रयोजन का उन्होंने दिल की गहराईयों से स्वागत किया। आबा ने सब के सुलभ-सहज़ दर्शन के लिए 'खास अतिथियों की कतार' श्रेणी में सब के सिद्धिविनायक दर्शन की व्यवस्था कर दी थी! ऊपर कैलाशपति भगवान शिव जी और माता पार्वती जी की सुन्दर मूर्ति और गर्भगृह के मध्य में सिद्धि विनायक की मूर्ति देख सब भाव-विभोर हो गएँ थे! इतनी शान्ति और सुकून उन्हें शायद ही कहीं और नसीब होता! अपार भीड़ के बावजूद भी मन्दिर प्रशासन की बेहतरीन व्यवस्था से सभी प्रभावित और आनंदित थे! उन्होंने विनायक जी को फूल मालाएं, पुष्प, नारियल अर्पित किएं और पुजारी जी ने वापस दिएँ फूल लेकर सभी अतिथि दर्शन सम्पन्न कर बाहर निकले! बाहर की सीढ़ियों पर कुछ पल ठहर कर, विश्राम कर वो आगे मुषकों की ऒर बढ़े! मान्यता हैं यहाँ मुषक के कान में कहीं गई मन की इच्छा गणेश जी जरूर पूरी करते हैं, हर पावन काम सहज़ सिद्ध करते हैं! आबा ने सभी के लिए प्रसाद के बॉक्स लिए और कुछ समय वहाँ शान्ति से सिद्धिविनायक जी की मूर्ति को जी-भर कर निहार सभी वापस होटल की तरफ निकल पड़े!

आज युवा ब्रिगेड के नाटक का मंचन तथा विनय के माता-पिता का सत्कार समारोह था! सभी को कार्यक्रम में समय पर उपस्थित रहना था! 'इंडो-नेपाल सांस्कृतिक समिति' के पदाधिकारी भी हॉटेल में नेपाल से आए अपने मेहमानों का स्वागत करने पहुँच चुके थे! उन्होंने सभी मेहमानों को फूलों का गुलदस्ता भेंट किया, औपचारिक निमंत्रण भी दिया और समय पर कार्यक्रम में पधारने की विनती की। सभी आबा के प्रयासों से अभिभूत थे जिम्मेदारी को पूरी क्षमता तथा गरिमा से निभाने का आबा का हुनर देख सभी प्रसन्न थे। भोजन के लिए समय पर आने का वादा कर, सिद्धिविनायक जी की प्रसादी का बॉक्स लेकर सभी अपने-अपने कमरे की ऒर कुछ समय विश्राम करने चले गएँ!
आज मित्र-मण्डली की असली परीक्षा थी! रिहर्सल में उनके नाटक की सभी नें दिल खोल कर प्रशंशा की थी लेकिन विभा को कुछ सुधार की गुंजाईश नज़र आई और उसने अपनी टीम के साथ उस पर विचार कर सभी को अपने किरदार को और बेहतर तरीके से पेश करने का सुझाव दिया। सभी जल्दी-जल्दी घर पहुँच गएँ क्योंकि उन्हें विश्राम की जरुरत थी।
दो बजे पूरी मित्र-मण्डली वज्र के यहाँ इकठ्ठा होने वाली थी! सभी चीजों को चेक कर वो एक साथ महाविद्यालय के लिए निकलने वाले थे! आबा सिद्धिविनायक जी का प्रसाद लेकर घर पहुँच चुके और बच्चों को प्रसादी खिला कर, शुभकामनाएँ देकर ही वो हॉटेल लौटे। 

कॉलेज का ऑडिटोरियम आज दुल्हन सा सजा था! रंग- बिरंगी फूल मालाएं, टीमटीमाते छोटे-छोटे बल्ब की सुन्दर, आकर्षक लताएँ उत्सव का एहसास करा रही थी! 
कॉलेज का नामपट्ट भी नया लगा हुआ था! कॉलेज अपने पच्चहत्तर साल पूरे कर रहा था तो नविनीकरण भी जरुरी था! पच्चहत्तर सालों के अंतराल में कॉलेज अपने मस्तक पर कई हीरे-जड़ित ताज सजा चूका था! मुम्बई का नामचीन कॉलेज था वह और पुरखों की अद्भुत तथा अतुलनीय उपलब्धियों की थाती से मालामाल था यह महाविद्यालय! समाज को कई हीरे प्रदान किए थे इस महाविद्यालय ने!
युवा ब्रिगेड बहुत आशान्वित थी! कई दिनों बाद उन्हें स्वयं को प्रमाणित करने का सुवर्ण अवसर मिल रहा था! ऊपरवाला भी मानों उनकी जीवट और जद्दोजहद की परीक्षा लेने के लिए उतावला हो चूका था! 

सभी नें आबा को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया और 
वज्र की गाड़ी में बैठ चल पड़े कॉलेज की ऒर! नाटक के लिए जरुरी सब सामान डिक्की में रख दिया था और उसे विभा के साथ सही जगह पर पहुंचाने की जिम्मेदारी ड्राइवर को दी गई थी! वज्र नें आज छोटू को भी साथ लिया था छोटे-मोटे काम के लिए!
आबा हॉटेल पहुँच चुके थे! आराम मानों उनके लिए हराम था! जब देखो तब वह आयोजन के बारे में ही सोचते रहते! आबा अपने कमरे में पहुँच कर झटपट स्वयं तैयार होने में लग गाए! प्रतिभा जी ने पहले ही सब कपडे निकाल कर रख दिए थे! आबा और प्रमिला जी मानों दो शरीर एक आत्मा थे! एक-दूसरे के मन की बात बिना बोले ही समझ लेते थे! गिले-शिकवे करने की न आदत थी न फुर्सत! कमाल का भरोसा था उन्हें एक-दूसरे पर! आबा हिमालय थे तो प्रतिभा जी उनकी विराट छाया! दोनों दूल्हे के माता-पिता की तरह तैयार हो चुके थे और हॉटेल की लॉबी में समय से पंद्रह मिनिट पहले ही आकार सोफा पर विराजमान हो गएँ थे। आबा ने 'ट्रेवलर' को भी बुला लिया था और साथ में ठन्डे पानी की बोतलों से भरा बॉक्स भी गाड़ी में रखने के लिए कह दिया था! 

उत्साहित मेहमान समय पर पहुँच चुके थे! सभी के चेहरे चमक रहे थे उम्मीदों के उजालों से! अँधेरी गुफाओं के डरावने सायों को पीछे छोड़ उनके बच्चें आगे कदम बढ़ा रहे थे और वह तालियों की गड़गड़ाहट से उनका उत्साह बढ़ाना चाहते थे! आबा ने सभी को अपनी पारम्परिक वेशभूषा में आने की विनती की थी! किसी नें साफा तो किसी ने टोपी तो किसी ने धोती पहनी थी! प्रतिभा जी नऊवारी साड़ी में गज़ब की सुन्दर दिखाई दे रही थी! कमला जी राजपूती वेशभूषा में गज़ब ढ़ा रही थी तो राजरानी जी नेपाली परिधान में बहुत ही आकर्षक लग रही थी! जश्न का माहौल हॉटेल में भी बन गया था। आबा ने सबका तहेदिल से स्वागत किया और सभी ऑडिटोरियम की ऒर निकल पड़े!
विभा, यश, वज्र और वैदेही! चारों नें आबा का आशीर्वाद लेकर प्रसाद ग्रहण किया और निकल पड़े कॉलेज की ऒर! आज उनकी परीक्षा की घड़ी आ चुकी थी लेकिन सब जानते थे मन तनाव-रहित होना जरुरी है! 
यश बोल पड़ा, "विभा! मेरी प्यारी बंदरिया! बंदरिया के रूप में क्या जँचती हो यार! लगता हैं मैं ऐसे ही डमरु बजाता रहूँ और तुम नाचती रहो, मेरे डमरु की ताल पर! मार डाला...मार डाला....यार! क्या ठुमक-ठुमक कर नाच रही थी..और ये तुम्हारे ज़ालिम घुँघरु! यार! मन कर रहा था चुम लूं"
तभी विभा बोल पड़ी, " हाँ यार यश! आज नुक्कड़ नाटक में चूमना बंदरिया को...मजे कर यार....मजे कर आज! आज तेरा दिन हैं' सभी हँसने लगे! फिर वज्र की तरफ मुँह कर कर विभा बोली, " डॉक्टर साहब! आज इनाम में सौ की नोट नहीं, शकु को ₹500/-की असली नोट देना क्या! तभी वज्र बोल पड़ा, " चिंता मत कर शकु! मैं तो तुम कहों तो ₹ 2000/-का नोट दे दूँ... फिर देखना...ये झाँसी की रानी! मुझें नहीं किसी और को गालियाँ देने लगेगी दिल खोल कर " सब फिर हँसने लगे!
"वैदेही! यह शकुनि बाबा गोलगप्पे खुद खिलाता तो कितना मज़ा आता न! यह मदारी और शकु के बीच वहीं गोलगप्पे खाने की स्पर्धा अनाउंस कर देता... अमर होने का प्लान चेंज कर! क्या करेगा बेचारा! उसकी शकु नहीं बल्कि बंदरिया जो साथ थी उसके" सभी मुस्कुरा रहे थे तभी विनय के माता-पिता करीब आएं तो वज्र ने पैर छुएँ और कहाँ, "मम्मी जी! हमें आशीर्वाद दीजिये! हम विनय का नाम ऊँचा करेंगे! यह नाटक उसके प्रयासों का ही फल है! सभी नें वीरबहादुर सिंह जी तथा राजरानी जी के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया, सभी वरिष्ठ जनों को प्रणाम कर वह स्टेज के पीछे की ऒर चल पड़े! आबा ने अतिथियों के लिए आगे की कुर्सियाँ आरक्षित करवाई थी! 

वार्षिकोत्सव के कार्यक्रम का शुभारम्भ हो चूका था! विघ्नहर्ता की वंदना के साथ ही स्टेज पर अलग-अलग प्रस्तुतियाँ शुरू हो चुकी थी! देशभक्ति पर एक सुन्दर नाटिका प्रस्तुत की गई! फिर कोली नृत्य, बिहु नृत्य और एक हास्य-व्यंग की एकांकीका की प्रस्तुति हुई! कुछ समय के लिए पर्दा खींच लिया गया और पीछे कुर्सियां लगाई गई! अब सम्मान समारोह का आगाज हो चूका था! 
मंच पर सभी प्रतिष्ठित मेहमानों को आमंत्रित किया गया जिसमें आबा और विनय के माता-पिता शामिल थे! कॉलेज के पदाधिकारियों के सम्मान के बाद विनय के माता-पिता का नाम पुकारा गया! दोनों को शाल, श्रीफल, भारतीय परिधान से सजी सुन्दर थैली के साथ एक लिफाफा तथा मानचिन्ह भी दिया गया! यह सिर्फ उनका ही नहीं दो पडोसी देशों के सौहाद्रपूर्ण रिश्तों का भी सम्मान था!
विनय के पिता वीरबहादुर सिंह जी को दो शब्द कहने के लिए आमंत्रित किया गया! उनकी आँखें नम थी! एक सामान्य परिवार को विदेश में इतना प्यार, मान-सम्मान मिलेगा यह उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था! उन्होंने संस्था का आभार व्यक्त किया और भीगी आँखों से अपना स्थान ग्रहण किया! कुछ पल के लिए मानों समय थम सा गया था! 
मान-सम्मान का कार्यक्रम ख़त्म होते ही फिर रंगारंग कार्यक्रम शुरू हो गया। एक गीत की प्रस्तुति के बाद यश, विभा, वैदेही और वज्र के नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति थी!
सभी को उसका बेसब्री से इंतज़ार था और अंत में वह समय भी आ गया जब विभा नें बुलंद आवाज़ में नाटक की सीमित शब्दों में प्रस्तावना दी और यश फटे-पुराने कपडे पहन, हाथ में बंदरिया को बँधी रस्सी और लाठी लिए और दूसरे हाथ में डमरू लिए मंच पर पहुँच गया! श्रोताओं की सिट्टियों से सारा आसमान गूंज उठा और बंदरिया के रूप में विभा को नाचते-नाचते आते देख पूरा हॉल तालियों और सिट्टियों से गूंज उठा मानों युवा ब्रिगेड नें पहले ही बॉल पर छक्का जड़ कर बॉल को स्टेडियम के बाहर पहुंचा दिया था! बंदरिया का नाच, मदारी के संवाद सुन माहौल गर्म हो चूका था और बाद में बाबा शकुनि ने अपने संवादों से श्रोताओं को जीत लिया था.. अब शकु की एंट्री और डॉक्टर के संवादों नें तेज रफ़्तार घोड़ेकी लगाम खींच कर उसे लक्ष्य तक पहुंचा दिया था! वज्र के सारगर्भित चुटीले अंदाज़ में बोले गएँ संवाद और विषय को गंभीरता की ऒर ले जाती संवादकुशलता तथा सही समय के तालमेल ने लक्ष्य को हासिल कर लिया था! अंत की विभा की एक संदेशप्रद पंक्ति ने नुक्कड़ नाटक को एक सार्थक मोड़ पर पहुंचा दिया था! तालियों की गड़गड़ाहट के साथ पर्दा गिरा और हॉल में मौजूद सभी श्रोताओं तथा मेहमानों ने खड़े होकर तालियों की बौछार से कलाकारों को नवाजा और सभी भावुक हो कर नेत्रदान और अंगदान के जीवंत उदाहरणों को देख, उनकी जीवट, लगन, संघर्ष-क्षमता को महसूस कर भावुक हो गएँ.....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में.....


इस पर लोग क्या कह रहे हैं